मलाई गांव के निवासी नसीम द्वारा मोबाइल पर दिए गए तलाक के मामले में दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद एवं देवबंद स्थित दारूल-उल-उलूम स्थित इस्लामी संस्थाओं ने फतवा जारी कर दिया है। यह फतवा पति नसीम अहमद की याचिका पर दिया गया है। फतवे में कहा गया है कि इस्लामी शरीयत कानून के तहत तलाक के समय औरत का हाजिर होना जरूरी नहीं है। यदि मर्द ने होश-हवास के साथ तलाक दे दिया तो वह तलाक ही माना जाएगा। इसके बाद औरत पति के लिए परायी हो गई तथा बिना हलाला के पति के निकाह में नहीं आ सकती। इस फतवे पर दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती डॉक्टर मुकर्रम ने हस्ताक्षर किए हैं और दूसरे फतवे पर देवबंद के कई आलिमों के हस्ताक्षर हैं।
नसीम का निकाह 15 मई 2011 को राजस्थान के अलवर जिला अंतर्गत चेलाकी चौपानकी गांव निवासी असमीना के साथ हुआ था। कुछ दिन पूर्व नसीम अहमद ने मोबाइल फोन पर अपनी पत्नी को तलाक दे दिया।
बने दो गुट, 29 दिसंबर को पंचायत होगी
इस पर पिछले तीन दिनों से पंचायतों का दौर चल रहा था। पंचायत में दो गुट बन गए जिसमें एक गुट का कहना था कि मोबाइल पर दिया गया तलाक जायज नहीं है, जबकि दूसरा गुट इसे जायज बता रहा था। अब दो इस्लामी संस्थाओं ने इसी मामले पर फतवा भी जारी कर दिया है। इसके बावजूद मेव मुस्लिम पंचायत इस मुद्दे पर एक बडी पंचायत में फैसला करेगी।
पंचायती प्रतिनिधियों ने पति पक्ष को कहा है कि वह बड़ी पंचायत से पहले पांच लाख रुपये जमा करा दें। इसके बाद ही पंचायत करके फैसला सुनाया जाएगा। बीवी अपने बच्चों के साथ शौहर के घर में रह पाएगी अथवा नहीं यह भी पंचायत ही फैसला करेगी। जबकि पति पक्ष का कहना है कि पंचायत में अग्रिम जमा कराने के लिए उनके पास पांच लाख रुपये की नकदी नहीं है। इस बारे में 29 दिसंबर को पंचों के सामने अपना पक्ष रखा जाएगा।
दूसरी तरफ पति नसीम अहमद ने डीएसपी हथीन को शिकायत दी है। शिकायत में नसीम ने कहा है कि उसकी पूर्व पत्नी असमीना 23 दिसंबर से उसके घर में आकर रहने लगी है तथा उसने आत्महत्या करने की धमकी दी है। नसीम ने पुलिस से गुजारिश की है कि उसकी परित्यक्ता पत्नी को उनके घर से बाहर निकाला जाए जिससे कोई अप्रिय घटना न हो।