काशी के मजदूरों पर नोटबंदी की मार
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कैश की किल्लत से मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है। मजदूर सुबह काम की चाह में घरों से निकल कर लेबर चौक पर पहुंचते हैं, लेकिन घंटों के इंतजार के बाद अधिकांश को बैरंग घर लौट आते हैं। आलम यह है कि कई घरों का तो चूल्हा तक नहीं जल पाता।
शहर के महर्षि दयानंद चौक (आगरा चौक ) को लेबर चौक के नाम से भी जाना जाता है। वर्षों से यहां सवेरे ही राज मिस्त्रियों व मजदूरों का जमावड़ा लग जाता है। लोग भी कहीं और जाने के बजाए यहीं से ही उन्हें काम पर ले जाते हैं। नोटबंदी से पहले यहां सुबह नौ बजने के बाद अधिकांश लेबर को काम मिल जाता था, लेकिन उसके बाद से दोपहर तक मजदूर काम का इंतजार करते हैं व बाद में थक-हार कर घरों को लौट जाते हैं।
नोटबंदी के चलते सबसे अधिक गरीबी की मार दिहाड़ी दार मजदूरों पर पड़ी है। शहर में मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड व अन्य स्थानों से आए लोगों की बहुतायत है, जो कि मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने परिवार की गुजर बसर कर रहे हैं। नोटबंदी के बाद उनके पास दो वक्त का खाना भी जुटाना भारी हो रहा है। स्थिति ज्यादा बिगड़ती देख काफी मजदूर तो वापस भी जा चुके हैं। मजदूरों का कहना है कि स्थानीय निवासी को तो बाजार से सामान उधार भी मिल जाता है, लेकिन उन्हें अपना पेट भरना भी भारी पड़ रहा है, और अब मकानों का किराया कैसे चुकाया जाए, इसकी चिंता सताने लगी है।