एक माह से चल रही सर्राफा कारोबारियों की हड़ताल ने जेवरात बनाने वाले कारीगरों के बुरे दिन ला दिए हैं। हड़ताल के चलते जहां कारीगर तंगहाली में जीवन व्यतीत कर रहे हैं वहीं उनके सामने बच्चों की फीस व किताबें तक खरीदने का संकट पैदा हो गया है। परिवारों से अलग रहकर काम करने वाले अधिकांश कारीगर तो अपने गांव चले गए हैं।
सोने के गहनों पर उत्पाद शुल्क लगाने के विरोध में पिछले एक माह से सर्राफा व्यापारियों की हड़ताल चल रही है। जिससे जहां सर्राफा कारोबारियों का लाखों रुपये का धंधा चौपट हो गया है, वहीं गहने बनाने वाले श्रमिकों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लाले पड़ गए हैं। पलवल में करीब 200 सर्राफों की दुकानें हैं।
इनमें 500 से अधिक कारीगर काम करते हैं। इनमें से अधिकांश कारीगर पश्चिमी बंगाल व महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं। कुछ कारीगरों ने तो अपने परिवारों के साथ यहीं बसेरा कर लिया है, लेकिन अधिकांश अकेले यहां रहकर मजदूरी करते हैं। जिनके परिवार गांवों में रहते हैं, वह अपने गांवों को लौटने लगे हैं। इनमें आभूषण बनाने वाले कारीगर, गलाई पकाई करने वाले, छिब्बा, डोरी, औजार बेचने वाले, सोने की छिलाई व उजाल करने वाले, डाई काटने वाले कारीगर शामिल हैं।
व्यापारियों के पास बड़ी संख्या में काम करने वाले सहायक भी हैं। हड़ताल खुलती न देख कारीगर अपने प्रदेश वापस लौटने लगे हैं। जो यहां स्थायी रूप से रह रहे हैं, उनके सामने भी भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इन सभी को गहने बनाने के अनुसार ही मजदूरी मिलती है, लेकिन अब जब गहने बन ही नहीं रहे, तो मजदूरी कहां से मिले।
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- कारीगर एसोसिएशन के प्रमुख रमेश चंद का कहना है कि यहां पश्चिमी बंगाल के 75 फीसदी से अधिक कारीगर अपने गांव चले गए हैं। महाराष्ट्र के भी कई परिवार लौट गए हैं। कारीगर आर्थिक तंगहाली के चलते अपना समय किसी तरह से गुजार रहे थे, लेकिन अब बच्चों की स्कूल के नए सत्र की फीस व कांपियां-किताबें खरीदने के लिए भी रुपयों की सख्त जरूरत है। जब धंधा ही नहीं है, तो फिर गुजारा कैसे हो।
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- हड़ताल के चलते सर्राफा व्यापारी भी परेशान हैं। उनके सामने भी आर्थिक संकट पैदा हो चुका है। रविवार को हमारी जो बैठक हुई है, उसके अनुसार फिलहाल हड़ताल 10 अप्रैल तक जारी रखने का निर्णय लिया गया है। अगर बीच में कोई फैसला हो गया तो ठीक, वरना आगे भी बढ़ सकती है।
-राजेंद्र जैन, प्रधान सर्राफा एसोसिएशन, पलवल।