महम सीट
- फोटो : AMAR UJALA
हरियाणा विधानसभा का चुनावी दंगल शुरू हो चुका है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों का एलान कर रहे हैं। कहीं गठबंधन बन गए तो कहीं बनते-बनते रह भी गए। उम्मीदवारों के नाम के एलान के साथ चुनाव प्रचार भी जोर पकड़ने लगा है। इस सियासी हलचल के बीच कुछ खास सीटें चर्चा में हैं। कुछ ऐसी भी सीटें हैं जो हर चुनाव में चर्चा में रहती हैं। महम विधानसभा सीट भी ऐसी ही सीटों में शामिल है।
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी महम सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
पहले जान लेते हैं महम सीट के बारे में
1962 के पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान महम सीट अस्तित्व में आई थी। इस चुनाव में महम सीट अनुसूचित जाति के आरक्षित थी। 1962 के विधानसभा चुनाव में महम सीट से हरियाणा लोक समिति के राम धारी को जीत मिली थी। उन्होंने कांग्रेस के छज्जू राम को शिकस्त दी थी।
1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव 1967 में हुआ। इस चुनाव में रोहतक जिले की महम विधानसभा सीट से निर्दलीय महा सिंह को जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार बी. प्रसाद को 5514 मतों से शिकस्त दी।
हरियाणा में 1967 के बाद अगला विधानसभा चुनाव अगले ही साल यानी 1968 में हुआ। इस चुनाव में भी महम में कांग्रेस की तरफ से उतरे राज सिंह को जीत मिली। कांग्रेस उम्मीदवार राज ने पिछली बार निर्दलीय जीते महा सिंह को कड़े मुकाबले में 226 मतों से हराया था।
1972 के चुनाव में महम में राज सिंह को निर्दलीय उमेद सिंह के हाथों हार झेलनी पड़ी। उमेद सिंह को कड़े मुकाबले में 612 मतों से विजय मिली।
साल 1977, आपातकाल के बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव होते हैं। इस चुनाव में महम में मुकाबला जनता पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच हुआ। यहां जनता पार्टी के हर सरूप ने निर्दलीय उम्मीदवार वजीर सिंह को 13,985 मतों से शिकस्त दी।
अब आता है 1982 का हरियाणा विधानसभा चुनाव, वो चुनाव जिसने महम को राज्य की सबसे चर्चित सीटों में शामिल कर दिया। इस चुनाव में यहां से लोक दल के उम्मीदवार चौधरी देवी लाल थे। देवी लाल 1977 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने थे। 1979 में उनकी सरकार गिर गई। सरकार गिराई उनकी ही पार्टी के भजन लाल ने। भजन लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। 1980 का लोकसभा चुनाव आया तो देवीलाल सोनीपत लोकसभा सीट से जीतकर दिल्ली पहुंच गए।
महज दो साल बाद साल 1982 में राज्य के विधानसभा चुनाव होते हैं। महम में एक बार फिर देवीलाल ने ताल ठोंक देते हैं। इस चुनाव में लोक दल के उम्मीदवार चौधरी देवी लाल ने कांग्रेस के हर सरूप को 16,675 मतों से हरा दिया।
देवीलाल का इस्तीफा और उप-चुनाव
देवीलाल ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और राज्य की राजनीति में फिर से सक्रिय हो गए। 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या होती है। देश में दिसंबर 1984 में नए सिरे से चुनाव होते हैं। कांग्रेस 400 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनाती है। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री होते हैं। साल 1985 में एक समझौता होता है। राजीव-लोंगोवाल समझौता, इस समझौते में चंडीगढ़ को पंजाब को देने की बात होती है। देवीलाल इसका विरोध करते हैं और इसे हरियाणा के साथ अन्याय बताते हैं। इतना ही नहीं इस फैसले के विरोध में देवीलाल अपनी विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे देते हैं। 1985 में महम से इस्तीफे के बाद जब उप-चुनाव की बारी आई तो देवीलाल फिर से मैदान में उतरे और जीते भी।
1987 के विधानसभा चुनाव में भी महम में मुख्य मुकाबला चौधरी देवी लाल और सरूप सिंह के बीच हुआ। इस बार लोक दल के टिकट पर उतरे देवी लाल ने कांग्रेस उम्मीदवार सरूप सिंह को 25,981 मतों से पराजित किया। इस चुनाव से पहले देवी लाल पूरे हरियाणा में राजीव-लोगोंवाल समझौते के खिलाफ अपने चालाए अभियानों के चलते बहुत मजबूत होकर उभरे थे। राजीव-लोगोंवाल समझौते के खिलाफ देवीलाल पूरे हरियाणा में न्याय युद्ध के नाम से अभियान शुरू करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने रास्ता रोको आंदोलन भी चलाया। यह आंदोलन पूरे हरियाणा में फैल गया था। 1987 के जब चुनाव नतीजे आते हैं तो देवीलाल की पार्टी को राज्य की 90 में से 60 सीटों पर जीत मिलती है। देवीलाल का गठबंधन 85 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रहता है। कांग्रेस महज 5 सीटों पर सिमट जाती है। इसी ऐतिहासिक जीत के बाद 20 जून 1987 को देवी लाल फिर से हरियाणा के मुख्यमंत्री बनते हैं। हालांकि, पिछली बार की तरह उनका यह कार्यकाल भी पूरा नहीं हो पाता है।
महम सीट पर उप-चुनाव और हिंसा
दरअसल, 1989 के लोकसभा चुनाव से पहले राजीव सरकार के मंत्री वीपी सिंह ने बोफोर्स मामले में पार्टी छोड़ दी। उन्होंने विपक्षी दलों को एकजुट करके जनमोर्चा बनाया। जिसे बाद में जनता दल नाम दिया गया। लोकदल के देवीलाल भी इस जनता दल का हिस्सा बन गए। 1989 मुख्यमंत्री रहते देवीलाल ने लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। जीत के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी और विधायकी छोड़ दी और देश के उप प्रधानमंत्री बने। महम सीट पर एक बार फिर उप-चुनाव की नौबत आई और नौबत आई नया मुख्यमंत्री चुनने की भी। दो दिसंबर को जब देवीलाल ने देश के उप प्रधानमंत्री पद की शपथ ली उसी दिन उनके बेटे ओप प्रकाश चौटाला ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। चौटाला महम सीट से उप-चुनाव में भी उतरे। फरवरी 1990 में महम के मतदाताओं ने उप-चुनाव के दौरान वोट डाला। इस चुनाव में मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के पक्ष में बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग के आरोप लगे। इस दौरान जमकर हिंसा हुआ। हिंसा में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई। इसके चलते मतदान रद्द कर दिया गया। इसके बाद मई में नए सिरे से चुनाव होना तय हुआ। यह चुनाव भी रद्द करना पड़ा। दरअसल, इस चुनाव में चौटाला की पार्टी के बागी अमीर सिंह भी महम से ताल ठोक रहे थे। चुनाव के दौरान अमीर सिंह की हत्या कर दी गई। इस हत्याकांड के छीटे भी चौटाला परिवार के दामन पर पड़े। एक बार फिर चुनाव रद्द हुआ। आखिरकार 22 मई 1990 को ओम प्रकाश चौटाला को इस्तीफा देना पड़ा।
1991 के विधानसभा चुनाव में महम सीट पर कांग्रेस के आनंद सिंह दांगी को सफलता मिली। दांगी ने जनता पार्टी के उम्मीदवार सूबे सिंह को 26,349 मतों से हरा दिया।
1996 के विधानसभा चुनाव में आनंद सिंह दांगी एक करीबी मुकाबले में हार गए। उन्हें सोशल एक्शन पार्टी के उम्मीदवार बलबीर के हाथों 257 मतों से हरा का सामना करना पड़ा। 1996 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2000 में हुए। इस बार बलबीर इंडियन नेशनल लोक दल के टिकट पर मैदान में थे। उनके सामने एक बार फिर कांग्रेस की ओर से आनंद सिंह दांगी उतरे। बलबीर को इस चुनाव में 4,346 मतों से जीत मिली।
2005 के विधानसभा चुनाव में महम से कांग्रेस के टिकट पर आनंद सिंह दांगी उतरे। लगातार दो चुनाव हार चुके दांगी ने इस बार इनेलो उम्मीदवार राजबीर को 23077 वोटों से हरा दिया और दूसरी बार महम से विधानसभा पहुंचे।
2005 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2009 में हुए। इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ से एक बार फिर आनंद सिंह दांगी उतरे। उन्होंने इस चुनाव में इनेलो के शमशेर को 6966 मतों से पराजित किया।
2014 के विधानसभा चुनाव में महम का मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच हुआ। हालांकि, सियासी लड़ाई एक बार फिर आनंद सिंह के नाम रही। कांग्रेस के टिकट पर उतरे आनंद ने भाजपा प्रत्याशी शमशेर सिंह को 9657 मतों के अंतर से शिकस्त दी।
2019 के विधानसभा चुनाव में महम का मुकाबला कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच हुआ। इस चुनाव में निर्दलीय बलराज कुंडू ने कांग्रेस के चार बार के विधायक आनंद सिंह को 12,047 वोटों के अंतर से परास्त कर दिया। निर्दलीय प्रत्याशी बलराज कुंडू को 49,418 जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को 37,371 वोट मिले।
इस बार कौन आमने-सामने
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। हरियाणा की महम सीट पर मुकाबला दिलचस्प होने की उम्मीद है। सत्ताधारी भाजपा ने यहां से पूर्व कबड्डी खिलाड़ी दीपक हुड्डा पर दांव लगाया है। वहीं, कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायक आनंद सिंह दांगी के बेटे बलराम दांगी को चेहरा बनाया है। महम के मौजूदा विधायक बलराज कुंडू इस बार हरियाणा जन सेवक पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं।