कनीना। गांव गाहड़ा में महर्षि दयानंद की 200वीं जयंती पर दो दिवसीय आर्य समाज उत्सव मनाया गया। उत्सव की शुरुआत सुबह सात बजे हवन के साथ की गई। हवन में मुख्य यजमान विजेंद्र सिंह, महेश कुमार सपरिवार रहे। सुबह नौ बजे से दोपहर एक बजे तक प्रवचन किए गए।
अमृतसर से आए दिनेश पथिक ने महर्षि दयानंद के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि महर्षि दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में एक पौराणिक ब्राह्मण परिवार में हुआ। कम उम्र में ही महर्षि दयानंद सच्चे शिव की तलाश में घर छोड़कर निकल गए। उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानंद को गुरु बना कर वहां पर वेदों की शिक्षा ग्रहण कर की। उसके बाद अपने गुरु के आदेश से ही उन्होंने ऋषियों की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने वेदों में निहित सिद्धांतों को ही समाज में प्रतिपादित कर रूढ़िवाद, पाखंडवाद से दूर रहते हुए समाज को एक निराकार ईश्वर की साधना करने का वेदोक्त मार्ग बताया।
उन्होंने बताया कि देश को आजादी दिलाने में महर्षि दयानंद की बहुत बड़ी भूमिका रही। इनकी प्रेरणा से भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपत राय जैसे अनेक क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता समर में भाग लिया। महर्षि दयानंद ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की थी। कार्यक्रम में स्वामी स्वदेश व बहन अंजली आर्य भजनों के माध्यम में संदेश के माध्यम से अपने कार्यक्रम पेश किए। जिसमें सैकड़ों गांव के आर्यजनों ने भाग लिया और भजनों का लाभ उठाया। इस दौरान आर्य समाज प्रधान सेवानिवृत्त कैप्टन राम सिंह, मंत्री अनिल परदेसी, पुरोहित धुरेंद्र शर्मा, सरपंच श्रीपाल यादव, रामेश्वर दयाल शास्त्री, राजवीर, मास्टर जगन्नाथ, महाराम, सतवीर सिंह, शेर सिंह, मास्टर वीरेंद्र सिंह, राम सिंह सहित अनेक ग्रामीण मौजूद रहे।