मंडी अटेली। हरियाली तीज कभी केवल व्रत और पूजा का त्योहार नहीं, बल्कि मायके-ससुराल के रिश्तों और सामाजिक मेलजोल का पर्व भी थी। बेटियों के लिए मायके से सिंधारा आता, उन्हें घर बुलाया जाता और महिलाएं मिलकर झूला झूलतीं, लोकगीत गातीं और पकवान बनाती थीं। समय के साथ व्यस्तता और बदलती जीवनशैली ने इन परंपराओं की रौनक कम कर दी है। अब कई रीति-रिवाज औपचारिकता बन गए हैं। हालांकि महिलाओं में तीज के व्रत और आस्था की परंपरा आज भी कायम है।
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गांव सैदपुर की 64 वर्षीय शीला काकस ने पुरानी तीज को याद करते हुए बताया कि पहले त्योहार से एक महीने पहले ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे। महिलाएं और लड़कियां लोकगीत गाते हुए सामूहिक रूप से झूला झूलती थीं। अब न झूले रहे, न उत्साह। लोग अपने तक सीमित हो गए हैं।
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अटेली निवासी 40 वर्षीय नीलम सोनी ने बताया कि पहले हरियाली तीज पर मायके से बेटियों और बहनों के घर सिंधारा भेजा जाता था और उन्हें मायके बुलाया जाता था। अब समय की कमी के चलते फोन पर पैसे भेजकर रस्म पूरी कर दी जाती है। त्योहारों की बदलती परंपरा चिंता का विषय है।
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गुजरवास की हंसा वर्मा ने पुरानी तीज को याद करते हुए बताया कि पहले महिलाएं रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर झूला झूलती थीं। मां बेटियों के लिए सुहालियां, शक्करपारे और मिठाई की कोथली भेजती थीं। लड़कियां चने के बिरवे बोने जाती थीं। अब ये परंपराएं केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
फोटो 03 हंसा वर्मा- फोटो : Archive
फोटो 03 हंसा वर्मा- फोटो : Archive