महेंद्रगढ़। महेंद्रगढ़ क्षेत्र में बुधवार को एक ही दिन अलग-अलग स्थानों पर हुई तीन आत्महत्या की घटनाओं ने लोगोें को झकझोर दिया है।
हालांकि इन घटनाओं के पीछे के ठोस कारण अभी स्पष्ट नहीं हैं लेकिन यह त्रासदी माता-पिता, शिक्षकों, समाज और नीति-निर्माताओं के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है, क्या हम अपनों की मानसिक स्थिति को समय रहते समझ पा रहे हैं। बता दें कि बुधवार को शहर के बुचौली रोड स्थित मोहल्ला शक्करकुई निवासी आईआईटी के 22 साल के छात्र धीरज सैनी, महेंद्रगढ़ की छाजूपुरम कॉलोनी निवासी महिला नर्सिंग अधिकारी सरिता और गांव सिगड़ी निवासी नरेश कुमार ने फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली थी।
हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की मानविकी एवं मनोविज्ञान पीठ की अधिष्ठाता व मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. पायल चंदेल ने बताया कि आत्महत्या का बढ़ता आंकड़ा चिंताजनक है। शैक्षणिक दबाव, भावनात्मक तनाव और परामर्श सेवाओं की अनुपलब्धता इसके प्रमुख कारण हैं। स्कूलों और घरों में सहयोगी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
कहा कि अब समय आ गया है कि हर गांव और मोहल्ले में एक काउंसलर की नियुक्ति की जाए। स्कूलों में परामर्श सेवाओं को संस्कृति का हिस्सा बनाना आवश्यक है। हर शिक्षक को छात्रों में मानसिक तनाव के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण देना चाहिए। छात्रों और अभिभावकों को उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य संसाधनों के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है। जैसे गणित और विज्ञान को प्राथमिक स्तर से पढ़ाया जाता है, वैसे ही मनोविज्ञान को भी जीवन कौशल के रूप में बच्चों को सिखाना चाहिए।
आज का समाज वर्चुअल होता जा रहा है, जहां एक ही छत के नीचे रहते हुए भी परिवारों में संवाद नहीं होता। हर कोई स्क्रीन में डूबा है। हमें सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स की ज़िंदगी की जानकारी होती है, लेकिन अपने बच्चों के मन की बात नहीं जान पाते। आत्महत्या से पहले व्यक्ति कई बार भीतर ही भीतर मरता है, लेकिन कोई देख नहीं पाता।
मनोविज्ञान विभाग हकेंवि के डॉ. रविप्रताप पांडेय का कहना है कि विभिन्न आयु वर्गों में आत्मघाती कदम उठाने के कारण भिन्न-भिन्न होते हैं। बचपन और किशोरावस्था में कई बार बच्चे गैर-आत्मघाती आत्म-क्षति जैसे व्यवहार अपनाते हैं, जो भविष्य में गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और आत्महत्या करने की प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है। छात्र जीवन में शैक्षणिक तनाव और असफलता का भय आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। वयस्कों में काम और निजी जीवन के बीच संतुलन न बना पाने की समस्या मानसिक तनाव को जन्म देती है।
अधिवक्ता रेखा यादव का कहना है कि वर्तमान में शिक्षा, प्रेम, पारिवारिक दबाव, माता-पिता से दूरी, अकेलापन व नशे की प्रवृत्ति आत्महत्या के बड़े कारण हैं। वर्तमान में सुविधाओं की चाहत ने हर वर्ग को परेशानी में डाल दिया है। युवाओं में शीघ्र कामयाबी की चाह के कारण लगातार दबाव व अवसादद को बढ़ा रहा है। वहीं एकल परिवारों की लगातार बढ़ रही संख्या ने भी हालातों को और अधिक गंभीर बना दिया है। युवा व विद्यार्थी जीवन में अपने परिवार से खुलकर विचार करना चाहिए। हर समस्या पर बात करने से हल निकलेगा।
इंसेट
बेरोजगारी, पढ़ाई का बोझ तनाव को बढ़ा रहा
मनोवैज्ञानिक डॉ. सूर्यकांत यादव का कहना है कि तनाव शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है लेकिन जब यह लंबे समय तक बना रहे और व्यक्ति के विचारों व निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो यह मानसिक रोग में बदल सकता है। समय रहते उपचार न मिलने पर यह व्यक्ति को निराशा और आत्महत्या जैसे चरम कदम की ओर ले जा सकता है। आर्थिक दबाव, बेरोजगारी, पढ़ाई का बोझ, रिश्तों में असंतुलन और सोशल मीडिया का असर लोगों में तनाव को बढ़ा रहा है।संकेतों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है।