महेंद्रगढ़। गांव लावण में बाबा समाधि वाले मंदिर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन पं. कुलदीप भारद्वाज ने भगवान श्रीकृष्ण- रुक्मिणी विवाह की कथा सुनाई। भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की झांकी सजाई गई। उन्होंने कहा कि रास जीव का परब्रह्म ईश्वर के साथ मिलन है। आस्था और विश्वास के साथ भगवत प्राप्ति का फल प्राप्त होता है तो उसे रास कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि जो भक्त ईश्वर प्रेम में आनंदित होते हैं और श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी के विवाह में शामिल होते हैं, उनकी समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। कथाव्यास ने कहा जब जीव में अभिमान आता है, भगवान उनसे दूर हो जाता है।
कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मिणी के साथ संपन्न हुआ। लेकिन रुक्मिणी को श्रीकृष्ण द्वारा हरण कर विवाह किया गया। इस कथा में समझाया गया कि रुक्मिणी स्वयं साक्षात लक्ष्मी है और वह नारायण से दूर रह ही नही सकती।
यदि जीव अपने धन अर्थात लक्ष्मी को भगवान के काम में लगाए तो ठीक नही तो फिर वह धन चोरी द्वारा, बीमारी द्वारा या अन्य मार्ग से हरण हो ही जाता है। धन को परमार्थ में लगाना चाहिए और जब कोई लक्ष्मी नारायण को पूजता है या उनकी सेवा करता है तो उन्हें भगवान की कृपा स्वत: ही प्राप्त हो जाती है।
इस मौके पर रामभक्त यादव, सुजान सिंह, कृष्ण यादव, मिलूराम यादव, लालसिंह यादव, सुभाष यादव, कुलदीप यादव, जयप्रकाश यादव, विद्या धन मिस्त्री, भूरी देवी, किरण देवी, कमलेश देवी, सुमित्रा, मनोज देवी, बिमला देवी मौजूद रहीं।