नारनौल। प्रदेश के अंतिम छोर पर बसा नारनौल शहर ऐतिहासिक स्मारकों की वजह से अपनी अलग ही पहचान बनाए हुए हैं। यहां स्थानीय लोग ही नहीं विदेशी पर्यटक राजस्थान में जाने से पहले नारनौल का दीदार करते हैं। अब शहर के ऐतिहासिक स्मारकों को लेकर प्रशासन भी गंभीर दिखाई दे रहा है। शहर में चाहे जलमहल हो या फिर अलीजान की बावड़ी, चोर गुंबद, बीरबल का छत्ता, इब्राहिम लोदी का मकबरा सभी स्थानीय लोगों के साथ-साथ अब विदेशी पर्यटकों को अपनी और आकर्षित कर रहे हैं। अब पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नारनौल के नजदीक ढोसी पहाड़ी पर रोपवे बनाने की तैयारी चल रही है। वह भी विदेश पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करेगा।
अली जान की बावड़ी में मिर्जा अलीजान व उनकी रानियां करती थीं स्नान
यहां के नवाब मिर्जा अलीजान द्वारा 1556-1605 ईसवी में इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। बावड़ी के मुख्य धनुषाकार प्रवेश द्वार पर तख्त स्थित है। दक्षिण में मुख्य धनुषाकार प्रवेशद्वार तीन मंजिला बावड़ी और एक कुएं के साथ जुड़ा हुआ है। इस कुएं के माध्यम से इस बावड़ी में पानी आता है। इस बावड़ी में मिर्जा अलीजान व उनकी रानियां स्नान करती थी।
जल महल भी युवाओं को अपनी और कर रहा आकर्षित
जलमहल का निर्माण शाह कूली खान द्वारा 1591 में किया गया था। जल महल का निर्माण लगभग 11 एकड़ के विशाल भूखंड पर किया गया है। यह विशाल तालाब के बीच में स्थित है। स्मारक तक पहुंचने के लिए एक पुल बनाया गया है। अब विभाग ने जलमहल की क्षतिग्रस्त दीवार की मरम्मत करवा दी गई हैं। जिसमें जल्द ही पानी भरा जाएगा। अभी भी प्रतिदिन सैकड़ों लोग जलमहल का दीदार करने के लिए आ रहे हैं।
चोर गुंबद समेटे है नारनौल का इतिहास
चोर गुंबद नारनौल का ऐतिहासिक स्थल कहा जाता है, जो हरियाणा पुरातत्व के द्वारा संरक्षित है। यह चौकोर आकार में एक सुव्यवस्थित बड़े आकार का स्मारक है, जिसमें प्रत्येक कोने पर चार मीनार है और एक कक्ष है। इसके चारों ओर एक खुला बरामदा होने के कारण यह बाहर से एक दो मंजिला संरचना का आभास देता है। इस संरचना का उपयोग संभवत चोरों और लुटेरों द्वारा छिपने के लिए किया गया था, जिसके बाद इसका वर्तमान नाम चोर गुंबद पड़ा। इसका निर्माण एक अफगान जमाल खान ने अपने मकबरे के रूप में करवाया था।
सुरंग से जुड़ा है ऐतिहासिक स्मारक बीरबल का छत्ता
नारनौल शहर के बीच राय बालमुकुंद दास का छत्ता स्थित है। यह छत्ता बीरबल के छत्ते के नाम से भी जाना जाता है। यह स्मारक मुगलकालीन शासक शाहजहां के समय नारनौल के दीवान छत्ता राय बाल मुकुंद दास ने बनवाया था। बताया जाता हैं कि गर्मी के मौसम के दौरान इसे ठंडा रखने के लिए भूमिगत कक्षों में झरनों का प्रबंध किया गया था। दक्षिण पूर्व के कोने में एक कुआं है जिसमें से पानी का जलाशय में भरा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि यह स्मारक दिल्ली, जयपुर, महेंद्रगढ़ तक सुरंग से जुड़ा हुआ है।
महर्षि च्यवन की तपोस्थली ढोसी के पहाड़ पर बनेगा रोपवे
ढोसी पहाड़ी पर 900 मीटर का रोप-वे बनाने की तैयारी चल रही है। ऐसे में रोप-वे बनने से विदेशी पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। नारनौल शहर से होते हुए राजस्थान के लिए प्रतिदिन सैकड़ों विदेशी पर्यटक आवागमन करते हैं। अब रोप-वे बनने से ढोसी की पहाड़ियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करेंगी। इससे नारनौल में ऐतिहासिक स्मारकों की तरफ भी विदेशी पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा और स्थानीय लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी।