अहीरवाल क्षेत्र रणबांकुरों की पावन स्थली रही है। भारत-चीन युद्ध से लेकर पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों सहित कारगिल युद्ध में भी यहां के वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी है। गांव गढ़ी रुथल निवासी स्व. बिरेंद्र सिंह ने भी अपने देश की रक्षा में अपनी शहादत दी थी जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है। उनकी वीरांगना मनभावती देवी को पति की शहादत पर गर्व है। उनका कहना है कि राष्ट्र परिवार से बढ़कर है। पिता की शहादत को प्रेरणा मानते हुए शहीद बिरेंद्र सिंह का बड़ा बेटा प्रवीण तथा छोटा बेटा टिंकू एमएससी पास करके उच्च पदों की तैयारियां कर रहे हैं। साथ ही अपने चाचा ओमप्रकाश लांबा के मार्गदर्शन में केंद्र सरकार द्वारा आवंटित गैस एजेंसी को भी इमानदारी के साथ चला रहे हैं। कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य पर ओमप्रकाश लांबा ने बताया कि बिरेंद्र सिंह के मन मे बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा था। वे भारतीय सेना में अपनी इच्छा से भर्ती हुए थे जहां कारगिल में दुश्मनों को नाकों चने चबाते हुए अपने प्राणों की कुर्बानी दे दी। ओमप्रकाश लांबा ने नम आंखों से बताया कि भाई के चले जाने का दुख तो है लेकिन शहीद का भाई होने के गौरव से सीना चौड़ा हो जाता है।