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Mahendragarh-Narnaul News: बद्रीनाथ धाम से आई बरात, कड़िया वाले मंदिर में हुआ तुलसी-शालिग्राम विवाह

Wed, 13 Nov 2024 01:22 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
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फोटो नंबर-07तुलसी व शालिग्राम जी के विवाह को लेकर कलश यात्रा निकालती महिलाएं। संवाद
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नारनौल। देवउठनी एकादशी के पावन पर्व को लेकर शहर के प्रसिद्ध कड़िया वाले मंदिर में मंगलवार को तुलसी-शालिग्राम विवाह का भव्य आयोजन किया गया। आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें शालिग्राम जी ब्रदीनाथ धाम से आए और तुलसी जी बालाजी महाराज के पवित्र धाम कड़ियां वाले मंदिर की रही।
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यह आयोजन कड़िया वाले मंदिर के पुजारी नरेंद्र शर्मा के पावन सानिध्य में हुआ। इस विवाह में तुलसी जी का कन्यादान मंदिर के पुजारी नरेंद्र शर्मा सहित विनीत पिलानिया, अशोक सिंघल, आदित्य शर्मा, नरेंद्र शर्मा लखनऊ तथा वरुण सिंघल आदि ने किया। तुलसी व शालिग्राम जी का विवाह सभी रीति रिवाजों व वेद मंत्रों के साथ संपूर्ण विधिविधान से किया गया। इस विवाह को राजस्थान के परसाना से आए आचार्य वासुदेव, पंडित देवेश, पंडित राजकुमार, पंडित राकेश तथा पंडित ज्योति द्वारा संपन्न करवाया गया।
बद्रीनाथ धाम से चलकर आई शालिग्राम जी की बरात दुलीचंद संघी धर्मशाला से बैंडबाजों के साथ चली और शहर के प्रमुख मार्गों से होती हुई मां चामुंडा देवी मंदिर पहुंची। यहां से 251 महिलाओं द्वारा बरात की अगुवाई की गई। फूलों की बग्गी में सजे शालिग्राम जी विशेष आकर्षण का केंद्र रहे और जगह-जगह लोगों ने उन्हें अपने कांधे का सहारा देकर पुष्प वर्षा की। वहीं धर्म नगरी बद्रीनाथ से बरात लेकर पधारे हनुमान प्रसाद डिमरी पुजारी नर्सिंग मंदिर जोशीमठ व संजय कुमार पुजारी भविष्य बद्रीनाथ भी बग्गी में सवार होकर चल रहे थे।
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कार्यक्रम में शहर के लोगों ने भारी संख्या में भाग लिया और कन्यादान भी करवाया। विधिविधान से विवाह संपन्न होने के बाद सभी के प्रतिभोज का आयोजन किया गया। केंद्रीय संस्कृत यूनिवर्सिटी जयपुर से आचार्य विष्णु कुमार निर्मल, आचार्य रामेश्वर दयाल, आचार्य सुभाष मिश्रा व आचार्य आनंद पाठक सहित अन्य आचार्य भी ऐतिहासिक महोत्सव के साक्षी बने। इस विवाह समारोह में पधारे आचार्यों ने बताया कि तुलसी व शालिग्राम विवाह देखने मात्र से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पुजारी नरेंद्र शर्मा ने इस भव्य आयोजन करवा समस्त क्षेत्र के कल्याण का कार्य किया है। पाणिग्रहण संस्कार करवा रहे आचार्य वासुदेव ने बताया कि पुराणों में ये कथा आती है कि वृंदा (तुलसी) जलंधर नामक दैत्य की पत्नी थी। वह पतिव्रता व धर्मपरायण थी। जलंधर और देवताओं के युद्ध के दौरान वृंदा के पतिव्रता धर्म के कारण जलंधर को हराना असंभव था। भगवान विष्णु जलंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास गए।इससे जलंधर की हार हो गई और वह युद्ध में मारा गया। वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर होने का श्राप दिया। वृंदा अपने पति की चिता के साथ सती हो गई। भगवान विष्णु द्वारा वृंदा से अगले जन्म में विवाह करने के आशीर्वाद के अनुसार, भगवान विष्णु ने शालिग्राम के रूप में देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी से विवाह किया था।
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