महेंद्रगढ़। गांव खातोदड़ा के बाबा नारायण दास मंदिर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन भीष्म स्तुति, राजा परीक्षित, नारद चरित्र, वामन अवतार, समुद्र मंथन, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र, नृहसिंह अवतार की कथा सुनाई।
कथा वाचक कुलदीप भारद्वाज ने कहा कि कि महाराज परीक्षित ने चौदह रत्नों के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट की। सुखदेव महाराज ने बताया कि समुद्र मंथन में मंद्राचल पर्वत को मधानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। राक्षसों ने नाग के मुख वाले हिस्से को और देवताओं ने पूंछ वाले हिस्से को पकड़ा।
जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब श्रीहरि ने कच्छप अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर धारण किया। मंथन से निकले विष का भगवान शिव ने पान किया। इससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। जीवन में जाने अनजाने कई पाप होते हैं। उनका ईश्वर के समक्ष प्रायश्चित करना ही पाप मुक्ती का उपाय है।
सत्संग में वह शक्ति है, जो इंसान के जीवन को बदल देती है। व्यक्तियों को अपने जीवन में क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, संग्रह का त्यागकर विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। उन्होंने कपिल चरित्र, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र, जड़ भरत चरित्र, नरसिंह के प्रसंगों पर प्रवचन किया। भजन मंडली की ओर से प्रस्तुत किए गए भजनों पर श्रोता भाव विभोर होकर नाचने लगे। वीरवार को कथा के चौथे दिन श्रीराम व श्री कृष्ण जन्म व सूर्यवंश व चंद्रवंश की कथा सुनाई जाएगी। इस मौके पर मुकेश देवी, सहीराम, प्रमोद, ब्रह्मदत, सुशीला, संतोष, मनीषा सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।