अगर आप नागरिक अस्पताल में अल्ट्रासाउंड करवाने जा रहे हैं तो आपको चार दिन की वेटिंग मिलेगी। यानी आज रजिस्ट्रेशन करवाने पर चार दिन बाद आपका अल्ट्र्रासाउंड होगा। ऐसे हालात जिला नागरिक अस्पताल के बने हुए हैं। जिले में एक मात्र अल्ट्रासाउंड मशीन होने की वजह से मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। कोविड के समय दूसरी पोर्टबेल अल्ट्रासाउंड मशीन आई थी लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की कमी की वजह से बंद पड़ी है।
50 से 60 किलोमीटर दूरी से मरीज अल्ट्रासाउंड करवानेे आते हैं उसको बाद उनको अगली तारीख मिलती है। इससे मरीजों को शारीरिक, आर्थिक व मानसिक रूप से परेशानी उठानी पड़ती है। यह परेशानी गरीब लोगों के लिए हैं। अमीर एवं मध्यमवर्ग के मरीज तो निजी अस्पतालों में जाकर अल्ट्रासाउंड करवा लेते हैं। जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से सरकार को कई बार रेडियोलॉजिस्ट की कमी के बारे में अवगत भी करवाया जा चुका है लेकिन अभी तक कोई रेडियोलॉजिस्ट सरकार की ओर से यहां नहीं भेजा गया।
मशीनें दो, रेडियोलॉजिस्ट मात्र एक
नागरिक अस्पताल में वर्तमान में दो अल्ट्रासाउंड मशीन हैं। इनमें एक पोर्टेबल मशीन है लेकिन इन मशीनों को चलाने के लिए मात्र एक रेडियोलॉजिस्ट है। रेडियोलॉजिस्ट की वजह से दूसरी मशीन का संचालन शुरू नहीं हो पा रहा। कुछ दिन पहले जिले में लगभग 30 चिकित्सकों ने ज्वाइन किया था। उनमें रेडियोलॉजिस्ट कोई नहीं था। इस समय जिले को एक रेडियोलॉजिस्ट की आवश्यकता है।
महीने में होते लगभग 1500 अल्ट्रासाउंड
जिले में प्रति माह लगभग 1500 अल्ट्रासांउड होते हैं। प्रतिदिन 50 से 60 मरीज का अल्ट्रासाउंड होते हैं। कई बार ज्यादा ओपीडी होती है तो यह संख्या 80 तक पहुंच जाती है। उसके बाद भी प्रतिदिन औसत 20 मरीजों को चार पांच दिन की तारीख दी जाती है। गर्भवती महिला, दिव्यांग व भर्ती हुए मरीज की उसी दिन अल्ट्रासाउंड किया जाता है। अन्य सभी प्रकार बीमारी संबंधित अल्ट्रासांउड की अगली तारीख ही मिलती है। कई बार गर्भवती महिलाओं को भी अगली तारीख दी जाती है।
मरीजों को काटने पड़ते हैं बार-बार चक्कर:
बता दें कि जिले में एक मात्र अल्ट्रासाउंड मशीन होने की वजह से जिले के सभी स्थानों से जांच के लिए यहां आते हैं। सतनाली के पास श्यामपुरा गांव लगभग 60 किलोमीटर, स्याणा-नौताना 55 किलोमीटर, आकोदा 40 किलोमीटर दूर से आतें हैं। वहीं नांगल चौधरी की ओर से भी 40 किलोमीटर दूर से मरीज यहां जांच के लिए आते हैं। मरीजों को पहले दिन रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है और उसके बाद चार दिन बाद की तारीख मिलती है। कभी कभार चिकित्सक छुट्टी पर चले जाने पर चक्कर दो से तीन हो जाते हैं। ऐसे में मरीजों को मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।