नारनौल। आबकारी विभाग से 7 गांवों में शराब ठेके न खोले जाने की मांग की गई है। विभाग ने आपत्तियों का डाटा पंचकूला स्थित मुख्यालय भिजवा दिया है। अब मुख्यालय में संबंधित गांवों के सरपंचों को बुलाकर पक्ष जाने के बाद निर्णय लिया जाएगा कि ठेका खुलना चाहिए या नहीं।
अक्सर देखने में आता है कि शराब का अधिक सेवन करने के बाद व्यक्ति अभद्र व्यवहार या आपत्तिजनक हरकतें करता है। इससे गांव की शांति भंग होती है व शराब के सेवन के बाद झगड़ा होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा नशे में महिलाओं व लड़कियों से छेड़छाड़ की वारदात का अंदेशा भी बढ़ जाता है। इससे ग्रामीण गांव में ठेका न खोले जाने के लिए भी आपत्ति पत्र देते हैं।
सबसे पहले ग्रामीण अपना बनाया प्रस्ताव बीडीपीओ कार्यालय में जमा कराते हैं। यहां से प्रस्ताव को डीडीपीओ में प्रेषित किया जाता है। इसके बाद ये प्रस्ताव आबकारी विभाग में आता है। पूर्व में ग्रामीण अपना आपत्ति पत्र सीधा आबकारी विभाग में जमा कराते थे। विभाग में प्रस्ताव आने के बाद संबंधित गांव के पुलिस थाने से दो साल के अवैध शराब के मामलों सहित पूरी जानकारी एकत्रित कर रिपोर्ट बनाकर मुख्यालय में भिजवाई जाती है। मुख्यालय से आदेश मिलने के बाद अधिकारी सरपंचों को सूचित करते हैं। बाद में तय तिथि पर सरपंचों को मुख्यालय पर बुलाया जाता है।
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ये 7 गांव हैं शामिल
ठेका न खोले जाने की मांग में गांव अमरपुर जोरासी, बास किरारोद, सिलारपुर मेहता, मंडलाणा, तलवाणा, भांखरी व ऊंची भांडोर शामिल है। गौरतलब है कि पिछले वित्तीय वर्ष में ऐसे गांवों की संख्या 11 थी।
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कितने लोगों के होने चाहिए हस्ताक्षर
जिस भी गांव में ठेका नहीं खोला जाना है, उस गांव की आबादी के 1/10 प्रतिशत लोगों सहित ग्राम सचिव व सरपंच के हस्ताक्षर पत्र पर होना जरूरी है। मान लें कि किसी गांव की आबादी 2 हजार है तो ऐसे में 1/10 प्रतिशत आबादी यानी 200 लोग, ग्राम सचिव व सरपंच के हस्ताक्षर होना आवश्यक है।
वर्जन
आबकारी एवं कराधान आयुक्त की ओर से सरपंचों के प्रस्ताव पर निर्णय करने व उनका पक्ष जानने के लिए मुख्यालय बुलाया जाता है। इसमें सभी सरपंच अवश्य पहुंचे, ताकि सही तरीके से उनकी मांगों पर विचार किया जा सके।-अनिल शर्मा, आबकारी एवं कराधान आयुक्त