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Mahendragarh-Narnaul News: 19 में सेना ज्वाइन की, 35 में मातृभूमि पर न्योछावर हुए थे शहीद वीरेंद्र

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फोटो नंबर- 20शहीद बिरेंद्र सिंह।
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मंडी अटेली। अहीरवाल क्षेत्र रणबांकुरों की पावन स्थली रही है। भारत-चीन युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध में भी यहां के वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी है। गांव गढ़ी रुथल निवासी बिरेंद्र सिंह ने भी अपने देश की रक्षा में अपनी शहादत दी थी जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई है।
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शहीद की पत्नी मनभावती देवी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है और मुझे अपने पति की शहादत पर गर्व है। बातचीत के दौरान अफसोस जाहिर करते हुए शहीद की पत्नी ने कहा कि सरकार ने पति को शहीद का दर्जा तो दे दिया लेकिन दो दशक बीत जाने के बावजूद भी न तो उनका कोई स्मारक स्थल बना है और न ही उनके नाम पर किसी स्कूल या मार्ग का नामकरण ही किया है।

पिता की शहादत को प्रेरणा मानते हुए शहीद बिरेंद्र सिंह का बड़ा बेटा प्रवीण व छोटा बेटा टिंकू एमएससी पास कर उच्च पदों की तैयारियां कर रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार की ओर से आवंटित गैस एजेंसी को भी चला रहे हैं।
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शहीद के भाई ओमप्रकाश लांबा ने बताया कि बिरेंद्र सिंह के मन में बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा था। वे भारतीय सेना में अपनी इच्छा से भर्ती हुए थे जहां कारगिल में दुश्मन को नाकों चने चबाते हुए अपने प्राणों की कुर्बानी दी।
ओमप्रकाश ने नम आंखों से बताया कि भाई के चले जाने का दुख तो है लेकिन शहीद का भाई होने के गौरव से सीना चौड़ा हो जाता है। बिरेंद्र सिंह के भतीजे एवं गढ़ी रुथल के सरपंच राहुल लांबा ने कहा कि शहीद मर कर भी अमर रहते हैं और दिव्य प्रकाश-पुंज बनकर भावी पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
35 साल की उम्र में हुई थे वीरगति को प्राप्त
बिरेंद्र सिंह का जन्म गांव गढ़ी रुथल में ही हुआ था। बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा लिए महज 19 साल उम्र में वह 18 ग्रेनेड बटालियन में भर्ती हुए। सिपाही के पद पर भर्ती होने बाद वह देश की सेवा में जुटे रहे और कुछ समय बाद वह लांस नायक पद पर पदोन्नत हुए। टाइगर हिल पर युद्ध आरंभ होने के दौरान 30 मई 1999 को वह दुश्मन से लोहा लेते हुए 35 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हो गए। 2 जून 1999 को उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ पैतृक गांव गढ़ी रुथल लाया गया। जहां राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया।
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