महेंद्रगढ़। इंदिरा गांधी मीरपुर विश्वविद्यालय (आईजी) बीए द्वितीय वर्ष में अंग्रेजी का पेपर सिलेबस से बाहर का आने पर छात्राओं ने पेपर का बहिष्कार कर दिया। सभी छात्राएं खाली सीट पकड़ाकर बाहर आ गईं और सेंटर अधीक्षक प्रवीण कुमार को कुलपति के नाम ज्ञापन सौंपकर दोबारा से पेपर करवाए जाने की मांग की है।
छात्राओं ने बताया कि इंदिरा गांधी मीरपुर विश्वविद्यालय का वीरवार को बीए चतुर्थ सेमेस्टर में अंग्रेजी विषय का पेपर था। उन्होंने बताया कि आज से ही चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा शुरू हुई थी। करीब 520 छात्राएं पेपर देने आई हुई थीं। पेपर वितरित करने के बाद जब उन्होंने पेपर पढ़ा तो 90 प्रतिशत पेपर सिलेबस से बाहर था। जो पुराने सिलेबस में बनाया हुआ था। एक मिनट के लिए सभी छात्राएं परेशान हो गईं। उसके बाद सभी ने एक साथ इसकी आवाज उठाई और पेपर नहीं देने का फैसला लिया। जब सेंटर अधीक्षक को इस बारे में अवगत करवाया तो उन्होंने विश्वविद्यालय में बात करने का आश्वासन दिया। उनके आश्वासन के बाद हम दो घंटे तक बैठे रहे। जब विश्वविद्यालय से कोई जवाब नहीं आया तो सभी खाली सीट पकड़ाकर सेंटर से बाहर आ गए। इसके बाद सभी छात्राओं ने मिलकर सेंटर अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर दोबारा से पेपर करवाने की मांग की।
बीए द्वितीय वर्ष की छात्राओं ने मुझे अंग्रेजी विषय का पेपर दोबारा करवाने के लिए ज्ञापन सौंपा है। मैंने ज्ञापन को मेल के माध्यम से आईजी विश्वविद्यालय के कुलपति को फारवर्ड कर दिया है। - प्रोफेसर प्रवीण कुमार, सेंटर अधीक्षक।
बीए द्वितीय वर्ष चतुर्थ सेमेस्टर का पेपर था। पेपर आउट ऑफ सिलेबस था। मैं पेपर की कई दिनों से तैयारी कर रही थी। जब पेपर देखा तो सबके होश उड़ गए। कोई प्रश्न सिलेबस से मेल नहीं खा रहा था। अगर विश्वविद्यालय दोबारा से पेपर नहीं करवाया तो एबीवीपी इसका पुरजोर विरोध करेगी। - पूनम भारद्वाज, उप प्रधान, महिला कॉलेज, (एबीवीपी)
पेपर देने के लिए काफी उत्साह था। काफी मेहनत की थी। आज जब पेपर देखा तो एक बार तो घबरा गई थी। थोड़ी देर में सभी ने पेपर को लेकर शिकायत शुरू कर दी। उसके बाद दोबारा जोश आया। बस मैं इतना कहूंगी की पेपर बनाते समय थोड़ा ध्यान रखना चाहिए। इससे न केवल विद्यार्थी का समय बर्बाद होता बल्कि सरकारी पैसा भी काफी खर्च होता है। - अंजू
छात्र जीवन में मैंने पहली बार आउट ऑफ सिलेबस पेपर देखा। इससे पहले केवल यही सुना था कि एक या दो प्रश्न बाहर से थे। लेकिन यहां तो हद हो गई पूरा 90 प्रतिशत पेपर बाहर से आया है। कहीं न कहीं विश्वविद्यालय प्रशासन की इसमें चूक रही है। जिसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। -मनीषा
पांच-सात प्रतिशत अंक के प्रश्न बाहर से आ जाए इतना तो चलता है लेकिन 90 प्रतिशत पेपर बाहर से आएगा तो बच्चे कैसे करेंगे। जो सिलेबस बच्चों ने कभी देखा नहीं उसमें से पेपर आ रहा है तो वों कहां से अटेंप्ट होगा। इस प्रकार की लापरवाही से विवि की सतर्कता पर भी सवाल खड़े होते हैं? -सपना