फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जिला के नौ वीर जवानों ने दी थी कारगिल में शहादत

विज्ञापन
विज्ञापन
जवान देश से कर गए वफा, प्रशासन परिजनों से कर रहा जफा
विज्ञापन

नारनौल। हरियाणा वीरों की धरा है। यहां के प्रत्येक गांव से कोई न कोई वीर जवान सेना में कार्यरत है। यहां के जवान देश से वफा करते हुए अपनी जान देश पर कुर्बान कर गए, लेकिन उनकी शहादत के बाद स्थानीय प्रशासन उनके परिजनों से किए गए वादों को पूरा नहीं कर सका। प्रशासन की इस जफा (अन्याय) से शहीदों के परिजन बेहद आहत हैं। कारगिल युद्ध में महेंद्रगढ़ के सैनिकों का पूरा योगदान रहा है। सबसे ज्यादा शहीद का दर्ज मिलने वाले सैनिक भी महेंद्रगढ़ से ही हैं।
भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन, कारगिल ओर रेजांगला युद्ध में यहां के वीरों ने भारत माता की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की है। कारगिल के युद्ध में भी प्रदेश के 78 जवानों में से नौ महेंद्रगढ़ के थे। कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले जवानों में गांव गुवानी के नायब सूबेदार लालसिंह, गांव गढ़ी रुथल के नायक बिरेंद्र सिंह, गांव रामपुरा के हवलदार रामसिंह, गांव गहली के नायक सतपाल, गांव नाहनी के गनर परमिंद्र सिंह, ककराला के हवलदार शिव कुमार, सोहला के हवलदार लेखराम, कोटिया के हनुमान सिंह और दोंगड़ा जाट के हवलदार खजान सिंह शामिल हैं। वह 26 जुलाई 1999 का दिन था। इस दिन हमने पाकिस्तान को शिकस्त देकर कारगिल पर फतेह पाई थी। यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। देश के लगभग 527 जांबाज सैनिकों ने अपनी शहादत दी थी।
विज्ञापन

महेंद्रगढ़ जिले में स्थित गांव गुवानी हरियाणा से सबसे ज्यादा सैनिक देने वाला गांव है। गांव के निवासी सूबेदार लालसिंह ने कारगिल युद्ध में जिले से पहली शहादत दी थी। उनका जन्म बीरबल सिंह यादव के घर हुआ। वह कारगिल लड़ाई से 18 साल पूर्व सेना में भर्ती हुए थे। 18 ग्रनेडियर रेजिमेंट में सूबेदार के पद पर थे। आपरेशन विजय के तहत द्रास क्षेत्र में तैनात लालसिंह 15 मई 1998 को आदेश मिलते ही साथियों के साथ 18 हजार फीट ऊंची चोटी को घुसपैठियों से मुक्त कराने के लिए चल दिए। रात में लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए लालसिंह अपने साथियों के साथ करीब-करीब मंजिल के नजदीक पहुंच भी गये थे। 28 मई तक उन्होंने 17000 फीट की ऊंचाई तय कर ली थी। वह आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक दुश्मन की ओर से आई गोलियों की बौछार ने उनके शरीर को छलनी कर दिया। घटना के हफ्ते भर बाद जब लालसिंह का शव अपनी शहादत का परचम लहराते हुए अपने पैतृक गांव पहुंचा तो उनको श्रद्धांजलि देने के लिए हजूम उमड़ पड़ा। लालसिंह का पूरा परिवार और ग्राम निवासी उनकी वीरता से आज भी गौरवान्वित है।

शहीद लालसिंह की प्रतिमा को ही बना लिया सहारा
शहीद लालसिंह के दो भाई सेना और बीएसएफ में कार्यरत हैं। आपरेशन विजय के समय विरेंद्र कुमार भी कश्मीर में तैनात थे। शहीद लालसिंह के पीछे विधवा पत्नी ग्यारसी देवी एक पुत्र अमित और दो पुत्रियां सुनीता, अनीता हैं। दोनों पुत्रियाें की शादी हो चुकी है। पुत्र अमित नारनौल स्थित शहीद लालसिंह के नाम से इंडेन गैस एजेंसी चला रहे हैं। शहीद की पत्नी ग्यारसी देवी अपने पति की शहादत पर आज भी नाज करती है।
गांव गढ़ी रूथल के निवासी सूरजभान यादव के पुत्र वीरेंद्र सिंह ने अपने बड़े भाई की प्रेरणा से शहादत के 15 साल पहले देश सेवा का मार्ग चुना और वह ग्रनेडियर रेजिमेंट में नायक के पद पर द्रास क्षेत्र में तैनात थे। 30 मई को तड़के 4 बजे टाइगर ब्रिज पर उनका आमना सामना आतंकी से हो गया। महेंद्रगढ़ के इस सपूत ने अदम्य साहस दिखाते हुए दो प्रशिक्षित मुजाहिदीन को मौत के घाट उतार दिया। इसी दौरान एक गोली उनके सिर में लगी और वह वीरगति को प्राप्त हो गए। शहीद की पत्नी मनभावती देवी को शहीद के नाम पर मंडी अटेली में इंडेन गैस की एजेंसी आवंटित की। मनभावती देवी को अपने पति की शहादत पर नाज है। शहीद के पुत्र टिंकू लाम्बा बी टैक कर चुके हैं तथा प्रवीण लांबा अभी छात्र हैं।
इनको हाथ लगी निराशा
रामसिंह के परिवार को नहीं मिली सहायता
गांव रामपुरा निवासी शहीद रामसिंह भी दुश्मन से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। परिजनों के अनुसार रामसिंह को शहीद का दर्जा अवश्य मिला, लेकिन उनकी पत्नी तारादेवी और उनके पुत्र भूदेव को सरकार ने आज तक सुविधाएं मुहैया नहीं करवाई हैं। बताया जाता है उनकी पत्नी ने गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनको निराश ही हाथ मिली। केवल उनके परिवार को पेंशन राशि ही उपलब्ध हो पा रही है।
शहीद सतपाल के परिजन भी हैं निराश
गहली गांव के शहीद सतपाल के परिजन भी सरकारी सेवाओं का लाभ न मिलने से निराश हैं। शहीद सतपाल की पत्नी इंद्रकौर ने बताया कि वह खेतीबाड़ी करती हैं। उन्होंने गैस एजेंसी, पेट्रोल पंप और प्लॉट आदि के लिए कई बार आवेदन किया, मगर सरकार ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। इस कारण उनके परिवार को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि इस समय उनको केवल पेंशन ही मिल रही है। बताया कि उनके पति जाट रेजिमेंट में थे। उन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। बताया कि उनका पुत्र दीपक फिलहाल पढ़ रहा है। उन्हें अभी तक किसी प्रकार की सहायता नहीं मिली है।। यहां तक कि उनके द्वारा लगाई गई मूर्ति के रख-रखाव का खर्चा भी वह स्वयं ही उठा रहे हैं।
विज्ञापन

नहीं है कोई स्मारक
कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए वीर जवानों के नाम पर महेंद्रगढ़ जिले में कोई स्मारक नहीं है। इस कारण यहां के फौजी जवानों और शहीद के परिजनों को मलाल भी है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें