अमर उजाला ब्यूरो
महेंद्रगढ़।
पर्यावरण संतुलन निरंतर बिगड़ता जा रहा है। उसको बनाने के लिए शारीरिक शिक्षक कड़ी मेहनत कर रहे हैं। गांव मेघनवास निवासी मनोज कुमार पिछले नौ वर्षों में लगभग 15 हजार पौधे लगा जा चुका है। इनमें लगभग 2700 पौधे पांच से सात फुट तक के पेड़ बन चुके हैं। लगभग छह हजार पौधे आज पेड़ बनने को हैं। शारीरिक शिक्षक मनोज मेघनवास ने बताया कि उनको पौधे लगाने की प्रेरणा उनके दादा मनसुख से मिली थी।
उन्होंने गांव में एक नीम का पौध लगाई थी जो पूरा पेड़ बन गया है। उन्होंने बताया कि जब वो छोटे थे तो अपने पिता ओमप्रकाश के साथ सार्वजनिक ट्यूबवेल पर पानी लेने के लिए जाते थे। उसके पिता कहते कि यह नीम का पेड़ उसके दादा ने लगाया है अब इन पौधों को बड़ा करना हमारा काम। वो आसपास के पौधों को पानी देते थे। उन्होंने बताया कि जब वो स्कूल में जाते थे तो वहां भी पौधे लगाते थे। इसके बाद उन्होंने प्रयास श्रीबालाजी संगठन के नाम से एनजीओ बनाई और इस काम में जुट गए। 2009 से वो पर्यावरण संरक्षण कार्य में जुटे हुए हैं। उनका लक्ष्य एक हजार त्रिवेणी लगानी है अब तक एक हजार त्रिवेणी लगाई जा चुकी हैं।
40 गांवों में लगाए छह हजार पौधे:
मनोज मेघनवास ने बताया कि जिले के 40 गांवों में 6 हजार पौधे लगाए जा चुके हैं। सभी पौधे दो से तीन फुट के हो चुके हैं अभी उनकी देखभाल चल रही है। उन्होंने बताया कि हकेंविवि, आईटीआई मालड़ा, आईटीआई दूलोठ अहीर, मुंडायन जलघर, सूरजनवास मंदिर सहित 125 स्थानों पर पौधे लगाए जा चुके हैं। बहुत से पौधे जल भी गए हैं।
2700 पौधे बन चुके हैं पेड़
मनोज ने बताया कि उनके संगठन द्वारा लगाए गए 2700 पौधे पेड़ के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि इनका लेटर भी सरकारी एवं निजी स्कूल वालों ने मिल चुका है। उन्होंने बताया कि इन पौधों की तीन साल तक देखभाल की। अब उनकी ऊंचाई पांच से सात फीट हो चुकी है जिनको अब पानी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि कुराहवटा, जांजड़ियावास, कोथल कलां, माजरा कलां, जेरपुर आदि गांवों के सरकारी स्कूलों, मंदिरों एवं निजी स्कूलों से उन्हें पेड़ तैयार करने का लेटर मिल चुका है।
प्रति वर्ष लेते हैं दो या तीन स्थानों को गोद
पर्यावरण प्रेमी मनोज ने बताया कि वो प्रति वर्ष दो-तीन स्थान गोद लेते हैं। गोद लेने के बाद उनमें प्रति वर्ष 500 पौधे लगाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि बालाजी संगठन में लगभग 200 युवा जुड़ चुके हैं। ये युवा पौधे की देखभाल करते हैं। उन्होंने बताया कि जिस गांव में जितने पौधे लगाते हैं उस गांव के दस युवाओं की टीम गठित की जाती है जो पानी डालने का कार्य करते हैं।