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अपने अंदर व्याप्त बुराइयों को छोडने का संकल्प ले लोग: मुनि

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अमर उजाला ब्यूरो
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नारनौल। प्रवचन में आने वाले वाला प्रत्येक व्यक्ति अगर एक-एक बुराई का त्याग कर दे तो वह समझेंगे की उनका प्रवचन देना सफल हो गया। यह बात धर्ममुनी महाराज ने शनिवार को मानक चौक स्थित जैन स्थानक भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कही।
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उन्होंने कहा कि जैन संत किसी से एक रुपये लेते नहीं केवल पेट के लिए भोजन लेते हैं वो भी घर-घर जाकर उदर पूर्ति के लिए। अगर देना ही है तो अपनी बुराईयों का त्याग करके इस चातुर्मास को स्वर्णिम करें। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग स्थानक भवन में आ रहे हैं। अगर वे अपने अंदर व्याप्त एक-एक बुराई को छोड़ने का संकल्प लें तो यह शहर कितना सुंदर व निर्मल बन जाएगा। मुनि ने कहा कि प्रवचन के दौरान सुनी गई बातों का थोड़ा अंश भी प्राणी के अंदर रह जाए तो उसकी काया पलट हो सकती है। माता-पिता का कर्तव्य है कि वो अपनी संतान को धर्म के मार्ग पर चलाएं। पैसा तो आनी-जानी चीज है। संस्कार हमेशा प्राणी के साथ रहते हैं। धनवान घर के प्राणी अधिक संस्कारवान हो उसकी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि निम्न घर में जन्म लेकर भी अनेक भव प्राणियों ने तीर्थकर गोत्र को प्राप्त किया है। इसलिए धर्म ही शाश्वत है धर्म का शरण कभी नहीं छोडना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि संसार में मतलब की दोस्ती है गलत कार्य में साथ देने वाले तो अनेक मिल जाएंगे, लेकिन सही मार्ग पर चलाने वाले दोस्त बिरले ही मिलते है। धर्म का मार्ग कठिन जरूर है क्योंकि इस मार्ग पर चलने वाले प्राणी को मान, माया, मोह कषाय जैसी बुराईयों का त्याग करना पड़ता है, लेकिन जो सौभाग्यशाली प्राणी इस मार्ग पर आगे बढ़ जाता है।
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