महेंद्रगढ़। गांव पाली के बाबा जयरामदास क्रिकेट स्टेडियम में आयोजित तृतीय विशाल श्रीमद्भागवत गीता महायज्ञ में 1500 जोड़ों ने महायज्ञ में सामुहिक रूप से आहुतियां दी। महायज्ञ में ओंकार रूपी भव्य एवं विशाल यज्ञकुंड तैयार किया गया तथा छह हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति में भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
महायज्ञ में चार क्विंटल गाय का शुद्ध घी, 250 किलो हवन सामग्री व 16 क्विंटल समिधाओं का उपयोग किया गया। कई दंपत्ति अपने घरों से भी श्रद्धापूर्वक घी एवं हवन सामग्री साथ लाए और विधिवत यज्ञ संपन्न किया। वेद मंत्रों की गूंज से संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत रहा।
महायज्ञ में निजी एवं सरकारी महाविद्यालयों की छात्राओं ने व स्वयंसेवकों सहयोग किया। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बेरी तथा अनहद शक्ति फाउंडेशन से जुड़े स्वयं सेवकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। विभिन्न शिक्षण संस्थानों से जुड़े स्वयंसेवकों ने सेवा देकर आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंची हरियाणा लोक सेवा आयोग की सदस्य ममता यादव ने संस्था के सेवा कार्यों, पौधरोपण, निर्धन बच्चों की आर्थिक एवं शैक्षिक सहायता तथा सोलह संस्कारों के पुनर्जागरण जैसे प्रयासों की सराहना की।
साथ ही समाज से ऐसे प्रयासों में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया। स्वामी धीरज गिरि ने कहा कि हजारों लोगों का गीता के प्रति ऐसा समर्पण भारत की उज्ज्वल सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण है। विधायक कंवर सिंह के पुत्र राहुल यादव ने भी गीता को जीवन का शाश्वत मार्गदर्शक बताया।
अनहद शक्ति फाउंडेशन की अध्यक्षा शैलजा यादव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17 का विस्तृत संदर्भ देते हुए कहा कि मनुष्य की श्रद्धा ही उसके व्यक्तित्व की दिशा तय करती है।
बच्चों में श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण श्रद्धा, सात्त्विक आहार, शुद्ध व्यवहार और उत्तम संगति के माध्यम से किया जा सकता है। यदि परिवार प्रतिदिन गीता का अध्ययन, चर्चा और जीवन में आचरण अपनाए, तो बाल मन में संयम, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति के संस्कार स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं।
उन्होंने कहा कि अध्याय 17 हमें यह सिखाता है कि जैसा आहार, वैसी विचारधारा, जैसी श्रद्धा, वैसा व्यक्तित्व, परिवार ही संस्कारों की प्रथम पाठशाला है। मंच संचालन सुधीर ने करते हुए संस्था के विभिन्न प्रकल्पों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया। यह महायज्ञ समाज को संस्कार, सेवा और संस्कृति से जोड़ने वाला एक प्रेरणादायी अध्याय बन गया।