दूूषित वातावरण से बढ़ रहे हैं एलर्जी व अस्थमा के रोगी
अमर उजाला ब्यूरो
नांगल चौधरी। जितनी तेजी से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उतनी ही तेजी से लोगों का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। दूषित पर्यावरण का असर बूढ़ों के अलावा युवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा है। बेहतर स्वास्थ्य के लिए लोगों को नियमित व्यायाम व खाने में संतुलित आहार लेना चाहिए, ताकि संभावित बीमारियों से बचा जा सके। उक्त विचार सीएचसी में कार्यरत डा. अविनाश पूनिया ने रविवार को उपचार करवाने आए मरीजों को व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि धूल, मिट्टी व धुआं आदि एलर्जी करने वाले तत्व जब शरीर में प्रवेश करते हैं, तो ऐसे तत्व एंटीजन एंटीबॉडी रियेक्शन करता है। जिसे एस्पेमेटिक अटैक कहते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में इस बीमारी को अस्थमा (दमा) रोग के नाम से भी जाना जाता है। जोकि एक्टिवेटिंग एजेंट (इज्योनोलॉजिकल ट्रिगर) जब शरीर में अपना प्रभाव छोड़ता है तो धीरे-धीरे उसके वायरस फेफड़ों में एकत्रित हो जाएंगे। धूल भरे वातावरण व ठंडे-गर्म माहौल में अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं। जिससे पीड़ित व्यक्ति द्वारा थोड़ा सा परिश्रम करने पर ही उसे सांस लेने में तकलीफ शुरू हो जाएगी। अस्थमा के रोगी को सामान्य तौर पर इन्हेलर दिया जाता है, ताकि बीमारी के प्रभाव को कम किया जा सके। अगर यह पहचान हो जाए कि व्यक्ति को किस चीज के कारण अस्थमा हुआ तो उसकी एंटी डॉट द्वारा नियंत्रण में किया जा सकता है। उन्होंने मरीजों को सुबह की सैर करने तथा स्वच्छ वातावरण में रहने की हिदायत दी।