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स्वास्थ्य विभाग द्वारा विभिन्न योजनाओं पर करोड़ों खर्च के बावजूद जच्चा-बच्चा मृत्यु दर पर नहीं लगा अंकुश

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अमर उजाला ब्यूरो
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नांगल चौधरी। योजना एक और मकसद भी एक, लेकिन विभिन्न सरकार की सोच एक जैसी नहीं होती, क्योंकि हर सरकार योजना का नाम बदलकर सफलता का श्रेय लेना चाहती है। इसी सोच के चलते जच्चा-बच्चा सुरक्षा योजना का 14 साल में 10 बार नामकरण हो चुका है। बावजूद मृत्यु दर पर अंकुश नहीं लग रहा, तीन साल में 6 फीसदी से अधिक औसत बढ़ चुकी है। विभाग की ग्राउंड रिपोर्ट से सरकार की सोच का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
गौरतलब है कि अधिकतर महिलाएं स्वास्थ्य को लेकर जागरूक नहीं होती। वे पौष्टिक भोजन नहीं लेती। जिस कारण एनीमिया, बीपी, शूगर, रूबेला जैसी भयानक बीमारियां पनपने लगी हैं। जिससे पीड़ित महिलाओं को प्रसव के दौरान जानलेवा खतरा बना रहता है। सुरक्षा को लेकर सरकार द्वारा 2004 में आरसीएच योजना क्रियान्वित की गई थी। सकारात्मक परिणाम नहीं मिलने पर 2005 में जननी सुरक्षा योजना लांच की गई। इसके बाद एमसीएच, एएनसी, एमसीटीएस, एटीएम समेत 10 योजनाएं चलाई गई। जिनके तहत गर्भवती महिलाओं को निशुल्क एंबुलेंस, दवाइयां, इलाज, चेकअप की सुविधा मिलती है। फिर भी मृत्यु दर की औसत कंट्रोल में नहीं हो रही। 2017 में किलकारी स्कीम का शुभारंभ किया गया था। इस योजना के अंतर्गत सभी गर्भवती महिलाओं का विवरण आरसीएच पोर्टल पर दर्ज करने के आदेश हैं। कंप्यूटराइज कॉल से टीकाकरण तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधित जानकारी मिलती रहेगी। आशा वर्कर और स्वास्थ्य सहायिकाओं को प्रत्येक गर्भवती महिला के संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि बीमार होने पर तुरंत इलाज मिल सके। इसके बाद सितंबर-अक्टूबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशानुसार प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा योजना लांच की गई। जिसके मुताबिक हर महीने की 9 तारीख को सीएचसी स्तर पर चेकअप कैंप निर्धारित है। अभी भी जच्चा-बच्चा की सुरक्षा संभव नहीं हो रही। हर साल औसत बढ़ने से लोग सरकार की योजना तथा खर्च किए गए बजट पर सवाल खड़े करने लगे हैं।
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तीन साल जच्चा-बच्चा की मृत्यु दर औसत
साल औसत (हजार पर)
2015 27
2016 32
2017 33

महिलाओं में एनीमिया की प्रमुख समस्या
जच्चा-बच्चा की मृत्यु दर को लेकर विभाग अलर्ट है। मरीज को घर बैठे ही जांच व इलाज का प्रबंध कर दिया गया। महिलाओं में एनीमिया की प्रमुख समस्या है। जिसके लिए आयरन की टेबलेट व अन्य इलाज दिया जाता है, लेकिन अधिकतर पीड़िता दवाइयां लेने को तैयार नहीं है। उनके परिजनों को भी अवगत करवा दिया गया, बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। जिन्हें प्रसव के दौरान जानलेवा खतरा संभव है।

डिलीवरी के 7-10 दिन बाद होती है समस्या
विभाग के मुताबिक प्रसव पीड़िता को महीने तक रक्तस्राव व अन्य बीमारियों की संभावना रहती है। 90 फीसदी जच्चा-बच्चा की मृत्यु डिलीवरी के 7-10 दिन के बीच दर्ज की गई है। इसलिए विभाग ने डिलीवरी के 45 दिनों तक निशुल्क एंबुलेंस, जांच व अन्य सुविधा उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, लेकिन प्रसव के बाद 95 प्रतिशत महिलाएं विभागीय सुविधा का लाभ नहीं लेती।

जागरूकता के बावजूद कंट्रोल नहीं हो रही स्थिति
विभाग के जिला मूल्यांकन एवं निरीक्षण अधिकारी दिलबाग सिंह ने बताया कि जच्चा-बच्चा मृत्यु दर पर अंकुश लगाने के लिए पीएचसी, सीएचसी स्तर पर कई मीटिंग हो चुकी है। एएनएम को गर्भवती महिला के संपर्क में रहने की हिदायत है। एएनसी पाजिटिव होते ही जांच व इलाज की प्रक्रिया शुरू करते हैं। बावजूद स्थिति कंट्रोल नहीं हो रही। इसके लिए एएनएम स्टाफ व पीड़िता के परिजनों को अलर्ट होना पड़ेगा।
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अस्पताल में कराएं डिलीवरी, वर्कर्स को डॉक्टर नहीं बनने की नसीहत
विभाग के जिला मूल्यांकन एवं निरीक्षण अधिकारी दिलबाग सिंह ने बताया कि 88 प्रतिशत डिलीवरी अस्पताल तथा 12 फीसदी घर पर होती है। घर पर कराई गई डिलीवरी से पीड़िता के एचबी टेस्ट, संक्रमण व अन्य जांच संभव नहीं होती। जच्चा व बच्चा को इंफेक्शन होने की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति में आशा या एएनएम को मरीज तुरंत अस्पताल में रेफर करना चाहिए। लापरवाही बरतना जानलेवा साबित हो सकता है।
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