कुरुक्षेत्र। प्रख्यात सारंगीवादक उस्ताद मामन खां की सारंगी से निकली स्वर लहरियों से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का ऑडिटोरियम उस समय गूंज उठा था जब उन्होंने इसकी झलक दिखाई। वे विश्वविद्यालय के रत्नावली महोत्सव में 28 अक्तूबर को मुख्यातिथि के तौर पर पहुंचे थे और सोहणी गायन शैली में सारंगी पर अंगुलियां थिरकी थी। अब वह 96 वर्ष की उम्र में बुधवार को अपनी जीवन लीला को पूरा कर परलोक सुधार गए हैं। इस उम्र में भी उनकी सारंगी से निकली स्वर लहरियों की धुन गूंज उठी थी। उनके निधन से कुवि परिसर में भी शोक की लहर दौड़ गई है।
रत्नावली महोत्सव में पहला मौका था कि राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात व उम्र के इस पड़ाव के कलाकार को 28 से 31 अक्तूबर तक हुए रत्नावली महोत्सव का बतौर मुख्यातिथि शुभारंभ किया। हिसार जिला के खरक पुनियां गांव के रहने वाले उस्ताद मामन खां ने नौ साल की उम्र में ही सारंगी को थाम लिया था। वह अपने दादा के साथ अनेक बार सारंगी वादन के लिए जाते थे और वर्तमान में उनके बेटे व आगे की पीढ़ी भी इसे अपना चुकी है। उनका कहना था कि सारंगी बेहद मुश्किल साज है। रत्नावली महोत्सव में प्रस्तुति देने के दौरान भी मामन खां को मंच तक सहारा लेकर पहुंचना पड़ा, लेकिन उनकी प्रस्तुति ने युवाओं में जोश और उत्साह भर दिया था। उनकी एक झलक पाने के लिए कुवि के छात्र-छात्राओं में होड़ सी लग गई थी। जिन्हें वे किताबों व मीडिया के जरिए ही देखते रहे, उन्हें सामने देख उत्साह से लबरेज हो उठे। पॉप गीतों पर थिरकने वाले युवा मामन खां की सारंगी की स्वर लहरियों में खो गए थे। वे प्रख्यात सांगी मांगे राम, रामकिशन ब्यास व धनपत सिंह के साथ भी लंबे समय तक काम कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन परिचय से भी युवाओं को अवगत कराया था तो उनके संघर्ष को जानकर युवा भी हैरान थे।