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सिविल अस्पताल में आई तीनों अत्याधुनिक मशीनें फांक रही धूल, निजी अस्पतालों में जेब ढीली कराने को मजबूर हो रहे मरीज

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एलएनजेपी अस्पताल में अत्याधुनिक मशीनें आने से मरीजों को बेहतर व निशुल्क स्वास्थ्य सुविधा मिलने की उम्मीद जगी थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी के कारण अस्पताल आईं इन मशीनों का मरीजों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिस वजह से मरीज भटक रहे हैं और महंगी फीस के रूप में अपनी जेबें ढीली कर रहे हैं।
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हालात यह हैं कि सितंबर 2017 में आई ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन अभी भी धूल फांक रही है। तीन साल के दौरान किस्तों में उपकरण पूरे हुए, लेकिन अब लाइसेंस जारी नहीं किया गया। डेंगू, एड्स एवं थैलेसीमिया जैसे अन्य कई श्रेणी के मरीजों के लिए बेहद उपयोगी मशीन बंद पड़ी हैं। यही नहीं लाखों रुपये खर्च कर सिविल अस्पताल में हृदय रोगियों के लिए लाई गई ईको मशीन बिना विशेषज्ञ जहां अढ़ाई साल से बंद पड़ी हैं। वहीं, वर्ष 2020 में अस्पताल आई टीएमटी मशीन अभी तक इंस्टॉल ही नहीं हुई। बताया गया कि जो विशेषज्ञ ईको मशीन को ऑपरेट कर मशीनों की जांच करता था, उनका करीब तीन वर्ष पहले तबादला हो गया था, जिसके बाद सिविल अस्पताल में ईको मशीन को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
जानकारी के अनुसार रोजाना 20 प्रतिशत हृदय रोगी उपचार के लिए सिविल अस्पताल पहुंच रहे हैं, जिनमें से 25 से 30 मरीजों की ईको एवं टीएमटी टेस्ट कराने के लिए निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ा रहा है। वहीं, डेंगू पीड़ित मरीज निजी अस्पतालों एवं ब्लड बैंक से भारी रकम अदा कर प्लेटलेट्स खरीदने को मजबूर हैं।
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लाइसेंस मिले बिना बंद पड़ी ब्लड सेपरेटर मशीन
हरियाणा स्वास्थ्य विभाग द्वारा सितंबर 2017 में करीब 20 लाख रुपये की लागत से सिविल अस्पताल भेजी गई ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन अभी तक शुरू नहीं हो सकी। तीन सालों तक आधे-अधूरे उपकरणों के चलते मशीन बंद कमरे में पड़ी धूल फांक रही हैं। जब उपकरण आए तो लाइसेंस नहीं मिला।
ईको मशीन के लिए नहीं है विशेषज्ञ, टीएमटी मशीन इंस्टॉल ही नहीं की
ईको मशीन से हृदय रोगियों का कार्डियोग्राफी टेस्ट दिल की संरचनाओं की वास्तविक गति को देखने के लिए किया जाता है। इसकी मदद से दिल की संरचनाओं को वास्तविक काल में देखा जा सकता है और मरीज के दिल की अंदरूनी तस्वीर बनाई जाती है, जिससे पता चलता है कि हृदय कितनी पंपिंग कर रहा है, जिससे विशेषज्ञ दिल संबंधित बीमारी से बड़ी आसानी से समझ सकते हैं, लेकिन सिविल अस्पताल में विशेषज्ञ न होने से यह मशीन पिछले दो साल से बंद पड़ी है। हृदय रोगियों को यह टेस्ट कराने के लिए निजी अस्पतालों में जेब ढीली करनी पड़ रही है। वहीं, वर्ष 2020 में अस्पताल आई टीएमटी मशीन को अभी तक इंस्टॉल नहीं किया गया। इस मशीन के माध्यम से न केवल हृदय रोगी की नसों में ब्लॉकेज का पता चलेगा, बल्कि समय रहते मरीज को उपचार देकर उसकी जान भी बचाई जा सकती है।
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नहीं हैं मशीन के लिए विशेषज्ञ : डा. सारा
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सारा अग्रवाल का कहना है कि ईको मशीन के लिए कोई विशेषज्ञ नहीं है और ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन की लाइसेंस प्रक्रिया चल रही है। जैसे ही मशीन का लाइसेंस मिलेगा, तभी मशीन चलाई जाएगी। उनका कहना है कि अस्पताल में टीएमटी मशीन आई ही नहीं।
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संवाद
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