कुरुक्षेत्र। समय के साथ अब होली के त्योहार में भी बदलाव देखा जा रहा है। पहले फाल्गुन शुरू होते ही इसका उत्साह शहर से देहात तक दिखने लगता था, जिसके चलते जहां घरों में कई दिनों पहले ही पकवानों को बनाने के लिए तैयारियां शुरू हो जाती थीं तो वहीं हर गांव और मोहल्ले के लोग एक जगह इकट्ठे होकर होली खेलने का आनंद लेते थे।
लोगों का कहना है कि अब होली के रंग फीके होकर रह गए हैं। भले ही रंगों का त्योहार है, लेकिन पहले वाला भाई-चारा अब फीका पड़ने लगा है, जिससे लोगों में भाई चारे की भावना कम होने लगी हैं। पहले पूरे गांव के लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर बड़े ही चाव से एक दूसरे को रंग लगाकर गले लगाते थे और घर पर तैयार की गई मिठाइयों से मुंह मीठा करवाते थे, लेकिन अब होली पर्व का त्योहार मात्र दिखावा बनकर रह गया है।
होली पर्व को लेकर अब जहां बाजार सजे हुए हैं तो वहीं दुकानों पर खरीदारी करने पहुंच रहे ग्राहकों को देखकर दुकानदारों के चेहरों पर भी रौनक देखने को मिल रही है। बाजार में कई तरह के रंग लोगों को भा रहे हैं। हर्बल कलर से लेकर कई तरह के गुलाल बाजारों में उपलब्ध हैं। इसके अलावा बच्चों के लिए कई तरह के कार्टून वाली पिचकारियां भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
पूरे गांव के लोग एक जगह होते थे इकट्ठे : नीलम रानी
नीलम रानी का कहना है कि अब होली में वो पहले वाली बात नहीं, जो पहले हुआ करती थी, पहले पूरे गांव के लोग एक जगह इकट्ठे होकर पूरे भाई चारे के साथ होली पर्व मनाते थे। युवाओं की टोलियां एक जगह पर इकट्ठी होकर गली मोहल्लों में जाती थी। घरों पर कई तरह के पकवान तैयार किए जाते थे। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक उन मिठाइयों का आनंद लेते थे।
महिलाएं गाती थीं होली के गीत : रश्मि रानी
रश्मि रानी का कहना है कि होली पर्व पर पहले लोग शोर शराबा नहीं करते थे। पूरे गांव की महिलाएं एक जगह पर इकट्ठा होकर होली के गीत होली से कई दिनों पहले गाना शुरु कर देती थी। साथ ही मिठाइयों को भी होली के लिए घर पर तैयार किया जाता था। होली वाले दिन एक जगह पर लोग इकट्ठे होते थे और होली मनाने के बाद मिठाइयां खाते थे। जबकि अब लोग होली पर्व पर डीजे बजाकर डांस करते हैं। अब पहले वाली बात होली पर्व में नहीं रह गई।
बेटियों को भेजे जाते थे उपहार : सुनीता रानी
सुनीता रानी का कहना है कि पहले होली पर्व पर भाईचारा देखने को मिलता था, लेकिन अब होली में बदलाव देखने को मिलता है। पहले होली पर्व पर भेदभाव नहीं होता था। गांवों में औरतें मुंह पर कपड़ा बांध कर कोड़े मारती थी और पुरा गांव के लोग इसका आनंद लेते थे। जबकि होली से एक दिन पहले माता-पिता बेटियों के घरों पर होली के उपहार भेजते थे। घरों पर लोग मिठाइयां तैयार करते थे। बाजारों में तैयार की गई मिठाइयों से लोग परहेज करते थे।