कुरुक्षेत्र। विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सहयोग से 10 से 12 तक तीन दिवसीय बहुभाषी अनुवाद कार्यशाला का उद्घाटन किया गया। इस दौरान कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विविधता को जीवित रखने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा किसी भी संस्कृति का प्रतिबिंब है। भाषा केवल एक शब्दों का संग्रह व मेल ही नहीं बल्कि किसी भी संस्कृति को जानने का मुख्य स्रोत है। भाषा संचार और सामाजिक सामंजस्य का आधार है। अनुवाद केवल शब्दों का नहीं बल्कि सांस्कृतिक भावना और विचारधारा का एक सेतु है।
विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह ने कहा कि यह कार्यशाला अपने प्रकार की पहली शैक्षणिक पहल है जिसका उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच संवाद और अनुवाद परंपरा को सुदृढ़ करना है।
कुलपति ने कहा कि कुरुक्षेत्र हरियाणा का एकमात्र सरकारी विश्वविद्यालय है जिसे नैक की ओर से ए-प्लस-प्लस ग्रेड प्राप्त है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को इसके सभी आयामों के साथ विवि में ही नहीं बल्कि संबंधित 295 महाविद्यालयों में लागू करने वाला देश का पहला विश्वविद्यालय है। कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि यह खुशी की बात है कि इस कार्यशाला में आठ भाषाओं का अनुवाद करके विभिन्न साहित्यिक रचनाओं को मूर्त देने का कार्य किया जाएगा। आजकल हम एआई टूल से भी अनुवाद करने के मदद ले रहे हैं। चैट जीपीटी एआई टूल की मदद से केवल अनुवाद किया जा सकता है वो सटीक है कि नहीं या वह भाव उस अनुवाद में है जो हमें चाहिए, यह कार्य सही तरीके व भावपूर्ण तरीके से केवल अनुवादक ही कर सकता है।
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के प्रधान डॉ. माधव कौशिक ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि अनपढ़ लोगों ने संस्कृति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अनुवादक का कार्य दुनिया का सबसे मुश्किल कार्य है। अनुवादक राष्ट्रीय साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का कार्य करता है। अनुवादकों ने उस पीड़ा का भी अनुवाद किया है जो आंखों में दिखाई देती है।
मुख्य वक्ता पंजाबी सलाहकार बोर्ड साहित्य अकादमी दिल्ली के संयोजक प्रो. रवेल सिंह ने कहा कि भाषा केवल शब्दों की नहीं होती बल्कि इसके पीछे एक विशाल सांस्कृतिक विरासत छिपी होती है, जिसे अनुवादक संवेदनशीलता के साथ पाठकों तक पहुंचाता है। हम 24 भाषाओं के लिए काम करते हैं। इस कार्यशाला में उत्तर भारत में बोली जाने वाली आठ भाषाओं (डोगरी, अंग्रेजी, हिंदी, कश्मीरी, पंजाबी, राजस्थानी, संस्कृत और उर्दू) को मुख्य केंद्र बनाया गया है।
कुलसचिव डॉ. वीरेंद्र पाल ने कहा कि इस तरह की बहुभाषी कार्यशालाएं विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को समृद्ध बनाती हैं और विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को रचनात्मकता के नए आयाम खोलने का अवसर प्रदान करती हैं। मंच का संचालन डॉ. लता खेड़ा ने किया।
इस अवसर पर छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी, प्रो. प्रीति जैन, प्रो. पुष्पा रानी, प्रो. विनोद कुमार, प्रो. सुशीला चौहान, प्रो. संजीव शर्मा, प्रो. कुलदीप सिंह, प्रो. सुनीता सिरोहा, प्रो. नीरा राघव सहित शोधार्थियों व विद्यार्थियों ने भाग लिया।