फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kurukshetra News: विभाजन की त्रासदी की गवाही देता है पिपली और नीलोखेड़ी क्षेत्र

विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। भारत विभाजन के दौरान पिपली में यह लगाया गया था शरणार्थी कैंप। सौ डॉ अतुल यादव
विज्ञापन
सेवा सिंह
विज्ञापन

कुरुक्षेत्र। वर्ष 1947 में देश के विभाजन का मंजर आज भी उन लोगों की आंखों में ताजा है, जिन्होंने अपना घर-बार छोड़कर भारत की ओर पलायन किया था। लाखों लोग बेघर होकर शरण की तलाश में निकले। कुरुक्षेत्र के पिपली में उस दौर में देश के सबसे बड़े शरणार्थी कैंपों में से एक स्थापित किया गया था। कैंप की क्षमता करीब एक लाख लोगों की थी, लेकिन हालात ऐसे बने कि यहां तीन लाख से अधिक शरणार्थी पहुंच गए।
पिपली में उमड़ी भीड़ केवल आंकड़ा नहीं थी, बल्कि विभाजन की उस पीड़ा की कहानी थी, जिसमें परिवार बिछड़ गए और लोग अपनी जमीन-जायदाद पीछे छोड़कर अनजान रास्तों पर निकल पड़े। कैंप में आने वाले अधिकांश लोगों के पास न रहने का ठिकाना था और न ही भविष्य की कोई निश्चितता थी। प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों ने राहत कार्य चलाकर विस्थापितों को संभालने का प्रयास किया। सीमापार से आने वाले लोगों के लिए यह कैंप कुछ समय के लिए आश्रय, भोजन और नई जिंदगी की उम्मीद का केंद्र बना।
विज्ञापन

-

नीलोखेड़ी में हुनर को बनाया पुनर्वास का आधार

विभाजन के बाद केवल लोगों को बसाना ही चुनौती नहीं थी, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी जरूरी था। इसी सोच के तहत नीलोखेड़ी में शरणार्थियों के हुनर को तराशने के लिए प्रशिक्षण केंद्र विकसित किया गया। इतिहासकार डॉ. अतुल यादव बताते हैं कि यहां लोगों को विभिन्न तकनीकी और व्यावसायिक कौशल सिखाने का प्रयास किया गया, ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। समय के साथ यही पहल आगे बढ़ती गई और नीलोखेड़ी का यह केंद्र तकनीकी शिक्षा के महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में विकसित हुआ। प्रशिक्षण और कौशल विकास की यह सोच आगे चलकर पॉलीटेक्निक संस्थान के रूप में आकार ले गई।



याद आती हैं तो छलक पड़ते हैं आंसू

विभाजन के समय विस्थापित होकर आए परिवारों की अगली पीढ़ियां भले ही आज सामान्य जीवन जी रही हों, लेकिन बुजुर्गों के लिए वह दौर आज भी दर्दनाक स्मृति है। पुराने दिनों को याद करते हुए कई लोगों की आंखें भर आती हैं। घर, खेत और पुश्तैनी जमीन छोड़ने का दर्द उनके मन में आज भी कायम है। पिपली का शरणार्थी कैंप और नीलोखेड़ी का प्रशिक्षण केंद्र इस बात के गवाह हैं कि विभाजन ने जहां लाखों लोगों को उजाड़ा, वहीं पुनर्वास की कोशिशों ने उन्हें नई जिंदगी शुरू करने का अवसर भी दिया। डॉ. अतुल यादव ने कहा कि इतिहास के ये पन्ने आज की पीढ़ी को विस्थापन की पीड़ा के साथ-साथ संघर्ष, आत्मनिर्भरता और नए सिरे से खड़े होने की कहानी भी बताते हैं।

-
आज भी हालात याद कर कांप जाती है रूह : धर्म चंद
पुराने शहर में रह रहे करीब 91 वर्षीय वैध धर्म चंद गांधी ने बताया कि विभाजन के दौरान जो हालात बने थे उन्हें याद कर रूंह कांप जाती है। वे बताते हैं कि पुरुषों को मारा जाने लगा था तो बच्चों को भी बख्शा नहीं जा रहा था। महिलाओं की अस्मत से खेला जाने लगा और उनकी हत्या भी की जाने लगी। इससे बचाने के लिए गांव-गांव लोगों को मुनादी कर घरों से निकाल कर पुलिस के कड़े पहरे में मकबरेनुमा किले में भेज दिया गया। वहां भी विशेष समुदाय के हमले का खतरा बना रहता। ऐसे में गर्म तेल से भरे कढ़ाहे रख दिए गए और महिलाओं को कहा गया कि यहां भी लूटने व मरने की नौबत आए तो इन कढ़ाहों में कूदकर जान दे देना।
विज्ञापन



सतप्रकाश रोशा बने थे प्रशासन व लोगों के बीच संवाद का आधार
शरणार्थी कैंप में आए अधिकतर लोगों की भाषा को उस समय के अधिकारी समझ नहीं पा रहे थे। उनके बीच संवाद की धुरी सतप्रकाश रोशा बने थे। यहां तक कि वे अवैतनिक सचिव लगाए गए और उनके हस्ताक्षर के बाद ही शरणर्थियों को सामान मिल पाता था। समाजसेवी अशोक रोशा बताते हैं कि उनके पिता बताते थे कि प्रदेश के विभिन्न शहरों में पिपली के कैंप से ही शरणार्थी भेजे गए गए थे। पाकिस्तान से सबसे पहले ट्रेन के जरिए इसी कैंप में लोग आते थे।

कुरुक्षेत्र। भारत विभाजन के दौरान पिपली में यह लगाया गया था शरणार्थी कैंप। सौ डॉ अतुल यादव

कुरुक्षेत्र। भारत विभाजन के दौरान पिपली में यह लगाया गया था शरणार्थी कैंप। सौ डॉ अतुल यादव

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें