कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग द्वारा तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत वीरवार को संस्कृत, पालि एवं प्राकृत विभाग ने तकनीकी सत्र आयोजित किया। सत्र में “युगों-युगों से संस्कृत वाङ्मय में कुरुक्षेत्र” विषय पर विद्वानों ने विस्तृत चर्चा की।
प्रथम सत्र के वक्ता प्रो. सुधीर कुमार (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) ने हरियाणवी संस्कृति में प्रचलित शब्दों और उदाहरणों की वैदिक साहित्य के आलोक में व्याख्या करते हुए कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व पर प्रकाश डाला। अध्यक्षता करते हुए प्रो. रणवीर सिंह (पूर्व निदेशक, संस्कृत प्राच्यविद्या संस्थान, कुवि) ने कहा कि वेदों को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने के बजाय उनके दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों को समझना चाहिए। द्वितीय सत्र के वक्ता डॉ. चितरंजन दयाल कौशल (निदेशक, संस्कृति अकादमी हरियाणा) ने कुरुक्षेत्र के धार्मिक महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र केवल भ्रमण स्थल नहीं बल्कि पवित्र तीर्थ है। तीर्थ वह स्थान है, जहां जलाशयों के समीप ऋषियों ने तप, यज्ञ और दान किए। सत्र की अध्यक्षता प्रो. भीम सिंह (पूर्व विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग एवं डीन, कुवि) ने की।