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Kurukshetra News: कच्ची घोड़ी लोक नृत्य में समाहित वीर तेजा जी की गौरव गाथा

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सेवा सिंह
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कुरुक्षेत्र। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र से आरंभ हुआ कच्ची घोड़ी नृत्य आज देश भर में मुख्य आकर्षण का केंद्र है। फरीदाबाद का सूरजकुंड मेला हो या फिर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में मनाया जा रहा अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव, हर मौके पर राजस्थान के लोक कलाकार न केवल इस नृत्य से समां बांध देते हैं बल्कि इसके जरिये वीर तेजा जी महाराज की गौरव गाथाएं भी देश प्रदेश में पहुंच रही है।

वर्तमान में धर्मनगरी के पवित्र ब्रह्मसरोवर तट पर अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में भी यह लोक नृत्य अपनी गहरी छाप छोड़ रहा है। देश-प्रदेश से पहुंच रहे पर्यटक इसे देखते ही ठहर जाते हैं। कलाकार इस नृत्य के जरिए इन पर्यटकों का मनोरंजन कर रहे हैं तो पर्यटक वीर तेजा जी महाराज के जीवन से प्रेरणा भी ले रहे हैं।
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इसी नृत्य के जरिये जन-जन तक वीर तेजा जी महाराज की गौरव गाथा पहुंचाने का बीड़ा उठाए हुए हैं राजस्थान के बूंदी जिला के गांव करवर के रहने वाले हर शंकर नागर, जो 40 वर्षों से इस लोक कला को जीवंत रखे हैं। यह तीसरा मौका है जब वे अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में अपनी टीम के साथ इस लोक कला की छटा बिखरने के लिए पहुंचे हैं। महोत्सव में आने वाले पर्यटकों का ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही वे इस नृत्य से स्वागत कर रहे हैं।




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... जब वीर तेजा जी ने सांप को दिया था वचन



उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र पटियाला से जुड़े राजस्थान के लोक कलाकार हरि शंकर नागर बताते हैं कि वीर तेजा जी महाराज की पत्नी बोडल की सहेली हीराबाई थी, जिसकी गायों को चुरा लिया गया था। इन गायों को बचाने के लिए वीर तेजा जी गए तो रास्ते में हुई एक घटना के चलते उनका सामना सांप से हुआ, जिसने उसके प्राण लेने को कहा। तेजी जी ने उन्हें दिया वचन निभाया और अपने प्राण दे दिए। गोवंश के लिए उनके इस साहस की गाथा ही वे इस लोकनृत्य के जरिये बताते हैं।


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लोक नृत्य के शौक में छोड़ दी पढ़ाई
लोक कलाकार हरि शंकर नागर बताते हैं कि वे पांचवीं कक्षा में ही थे कि उनकी लोक नृत्य को देख उसी में रुचि बढ़ने लगी और शौक बन गई। तेजा जी वीरता ने झकझोरा तो से वे इस लोक नृत्य में रम गए। पिछले 40 वर्षों में वे मुंबई, नागपुर, प्रयागराज, मंसूरी, दिल्ली, जयपुर सहित देश के अनेक शहरों में बड़े आयोजन के दौरान प्रस्तुति दे चुके हैं। वर्तमान में उनकी टीम में सत्यनारायण नागर, राजू लाल भाटी, राजेंद्र मीणा, राम कल्याण, शकुर मोहम्मद, दिलकुश शामिल है।


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सरकार उठाए ठोस कदम
हरि शंकर का कहना है कि युवा पीढ़ी को हमारी लोक संस्कृति से जोड़ना है तो सरकार को आयोजन के अलावा भी अहम कदम उठाने होंगे। ऐसी व्यवस्था जरूर हो कि लोक कलाकार का परिवार गुजारा कर सके। बाकायदा लोक कलाकारों को सांस्कृतिक विभाग से जोड़ा जाना चाहिए।
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शादी समारोह में कच्ची घोड़ी से होता है दूल्हे का स्वागत
कच्छी घोड़ी नृत्य राजस्थान का लोकनृत्य है, जो शेखावाटी क्षेत्र से आंरभ हुआ था। यह देश के अन्य भागों जैसे महाराष्ट्र, गुजरात आदि में भी प्रसिद्ध है। यह नृत्य आमतौर पर शादी समारोहों के दौरान दूल्हे पक्ष के स्वागत और मनोरंजन के लिए और अन्य सामाजिक समारोहों के दौरान किया जाता है। कुछ व्यक्तियों के लिए यह नृत्य एक पेशा भी है। यह नृत्य डमी घोड़ों पर पुरुषों द्वारा किया जाता है। पुरुष विस्तृत पोशाकें पहनते हैं, जिसमें लाल पगड़ी और धोती प्रमुख होती है।
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