कुरुक्षेत्र। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का त्योहार विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि वर्षभर में यह एकमात्र ऐसी रात होती है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर अमृत बरसाता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 6 को सोमवार को पड़ रही है और खास बात यह है कि यह पूर्णिमा रवि योग और पंचकों के संयोग में आ रही है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस कारण इसका फल पांच गुना अधिक प्राप्त होगा। पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत छह अक्तूबर को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट से होगी और समापन 7 अक्तूबर को सुबह नौ बजकर 16 मिनट पर होगा। चूंकि इस दिन चंद्रोदय 6 अक्तूबर की रात को हो रहा है, इसलिए व्रत और पूजन इसी दिन किया जाएगा।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य महत्व
ज्योतिष और आयुर्वेद दोनों ही मानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें औषधीय गुणों से भर जाती हैं। परंपरा है कि इस रात दूध या चावल की खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखी जाती है। सुबह इसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को भोग अर्पित कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। चांदनी में रखी खीर अमृत समान हो जाती है। इसे खाने से शरीर निरोगी रहता है, रोगों से मुक्ति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पंचकों और रवि योग का संयोग
ज्योतिषाचार्य रामराज कौशिक का कहना है कि कई वर्षों बाद शरद पूर्णिमा पर ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है जब यह पर्व रवि योग और पंचकों में पड़ रहा है। इस दिन शनि और चंद्रमा मीन राशि में रहेंगे। यह संयोग अत्यंत दुर्लभ है और मान्यता है कि व्रत-पूजन करने से चंद्र देव की विशेष कृपा प्राप्त होगी। इस कारण इस बार शरद पूर्णिमा का महत्व और भी बढ़ गया है और इसका फल पांच गुना अधिक मिलेगा। पूर्णिमा का दिन दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
मां लक्ष्मी का जन्म दिवस
श्री राधा रमण बिहारी मंदिर के पुजारी पं. राजेश कौशिक ने बताया कि आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्र देव अपनी 16 कलाओं में प्रकट होते हैं और अमृत बरसाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा का पर्व इस बार पंचकों और रवि योग के संयोग में आ रहा है।
कुरुक्षेत्र। प. राजेश कौशिक।
कुरुक्षेत्र। प. राजेश कौशिक।
कुरुक्षेत्र। प. राजेश कौशिक।