कुरुक्षेत्र। केयू के सीनेट हॉल में संबोधित करते मिन्मय मिशन से स्वामी मित्रानंद। पीआरओ
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में गुरु रविदास चेयर और चिन्मय मिशन ने संयुक्त रूप से एक संगोष्ठी आयोजित की। यह संगोष्ठी चिन्मय मिशन की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हुई। पुणे से प्रारंभ हुई चिन्मय मिशन की यात्रा 27 राज्यों से गुजरी। इसने लगभग 35,000 किलोमीटर की दूरी तय कर कुरुक्षेत्र की यात्रा पूरी की।
इस यात्रा का नेतृत्व चिन्मय मिशन के संत स्वामी मित्रानंद, ब्रह्मचारी सुधीर और ब्रह्मचारिणी तारिणी चिन्मय ने किया। यात्रा में 15 भक्तजन भी शामिल थे। अंबेडकर केंद्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कार्यक्रम बारे जानकारी दी। मुख्य वक्ता स्वामी मित्रानंद ने विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता को विश्व का महान ग्रंथ बताया। गीता प्रत्येक मनुष्य को सफल और सार्थक जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। उन्होंने युवाओं को गीता के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्व केयू कुलसचिव प्रो. वीरेंद्र पाल ने भारत की ज्ञान परंपरा और बौद्धिक संपदा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी प्रभाव शक्ति का प्रभावी उपयोग कर शीघ्र ही विश्वगुरु बन सकता है। छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी ने श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म के सिद्धांत पर विचार रखे। केडीबी मानद सचिव उपेंद्र सिंघल ने अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव की जानकारी दी। कुलसचिव ने स्वामी मित्रानंद को अंतरराष्ट्रीय गीता सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया।