संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत की जाए तो सफलता भी कदम चूमने लगती हैं। जीवन में आने वाली कड़ी चुनौतियां का सामना कर विकलांगता को मात देकर कई दिव्यांग जीवन में कामयाब हुए और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बने।
हर साल तीन दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगों के प्रति व्यवहार में बदलाव लाना, उनका सम्मान करना है। साल 1992 से दुनियाभर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय विकंलाग दिवस मनाया जाने लगा। विकलांग जनों को विश्व के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में गिना जाता है।
ऐसे में विकलांग जनों के उत्थान हेतु सभी देशों में विश्व विकलांग दिवस मनाया जाता है। विकलांग होते हुए भी जीवन में कई लोगों ने खास मुकाम हासिल किया है, कोई शिक्षा तो कोई बैंकों के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा है।
शिक्षक बन दे रहे विद्यार्थियों को सेवाएं
डॉ. सुनील थुआ कड़ी मेहनत कर शिक्षक बने और अपनी सेवाएं राजकीय महिला महाविद्यालय में 2017 से विद्यार्थियों को दे रहे है। बचपन में पोलियो होने के चलते कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठा तो कड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। घर की जिम्मेवारी मां के कंधों पर आई तो मां ने परिवार के लालन पालन में कोई कसर न छोड़ी। बेटे को पीएचडी करा शिक्षक बनाया।
मां और पिता ने बढ़ाई हिम्मत
निपुण गुप्ता ने लक्ष्य को चुन कड़ी मेहनत करते हुए केनरा बैंक में असिस्टेंट बने और पिछले पांच सालों से लोगों को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। साल 2007 में मात्र 15 साल की उम्र में पोलियो हुआ तो सब सपने टूटने लगे। घर से भी बाहर निकलने में भी शर्म महसूस होने लगी, लेकिन मां और पिता ने हिम्मत बढ़ाई तो बैंक की परीक्षा की तैयारी में जुटे और खास मुकाम हासिल किया।
कामयाबी हासिल कर बनाई अलग पहचान
डॉ. अंग्रेज सिंह पिछले आठ सालों से कुवि के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है, जो कि विद्यार्थियों को शिक्षित कर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बचपन से ही पोलियो का सामना कर कड़ी चुनौतियों से निकल प्रोफेसर बन अपनी अलग पहचानी बनाने में कामयाब हुए। बचपन में पोलियो होने के चलते पढ़ाई करने में दिक्कतें हुई, माता-पिता और शिक्षक का सहयोग मिला तो सफलता हासिल की।
मां ने बेटी को पढ़ाने का उठाया बीड़ा
प्रो. विजय लक्ष्मी ने कड़ी मेहनत कर खास मुकाम हासिल किया। वे पिछले सात सालों से करनाल के राजकीय पंडित चिरंजीलाल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर सेवाएं दे रही हैं। मात्र तीन साल की उम्र में लगने वाले पोलियो के इंजेक्शन से हुए इंफेक्शन के चलते शरीर पोलियोग्रस्त हो गया। उनकी मां ने बेटी के भविष्य को बचाने की ठानी और गोदी में उठाकर स्कूल तक ले जाने का बीड़ा उठाया।