संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूरी पर बस गांव कमौदा महाभारतकालीन है, जिसकी श्री काम्यकेश्वर तीर्थ से विशेष पहचान है। यह गांव जितना पुराना है, समस्याएं भी उतनी ही पुरानी है। हालांकि अभी तक गांव की कमान संभाले रही ग्राम पंचायतों ने अपने-अपने स्तर पर भरसक प्रयास कर गांव के विकास कार्यों को आगे बढ़ाया, लेकिन अभी भी अनेक कार्य किए जाने की दरकार है। ग्रामीण अब नई ग्राम पंचायत से उम्मीद लगा रहे हैं।
ग्रामीणों की मानें तो सरकार खेलों को बढ़ावा देने में लगी है और आसपास के गांवों से युवा खेलों में अपनी प्रतिभा दिखाते हुए गांव व प्रदेश का नाम रोशन कर चुके हैं, लेकिन यहां के युवाओं को आज तक खेल के लिए मैदान तक नहीं मिल पाया है। खेल ग्राउंड न होने के चलते युवा खेलने से वंचित है तो वहीं पुलिस व सेना में भर्ती के लिए भी अभ्यास तक नहीं कर पाते। गांव में दूषित पानी की निकासी आज भी ज्यों की त्यों है। गांव का जोहड़ गंदे पानी से भरा रहता है, जिसे फाइव पोंड बनाए जाने की जरूरत है। यहां से पानी निकासी भी नहीं हो पाती, जिससे बीमारी फैलने की आशंका बनी रहती है।
गांव में श्रीकाम्यकेश्वर तीर्थ महाभारतकालीन है। इसकी बड़ी मान्यता है और दूर-दराज से लोग यहां पूजा अर्चना के लिए पहुंचते हैं। यहां हर रविवारिय शुक्ल सप्तमी पर विशाल मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। गांव में प्राचीन प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर भी है, जिससे लोगों की आस्था जुड़ी है। कमोदा का नाम कामेश्वर वन से पड़ा था। यहां पर पांडवों द्वारा अज्ञातवास में ठहराव किया गया था।
ग्रामीण बताते हैं कि पिछले 18 माह में गांव की ज्यादा दुर्दशा हुई। इस दौरान न ग्राम पंचायतों के पास काम करवाने के अधिकार थे और न ही नई पंचायत बन पाई। सभी कार्य बीच अधर में लटक गए थे। सफाई व्यवस्था भी चरमरा गई थी। अब नई ग्राम पंचायत बनेगी तो अटके काम भी शुरू होंगे।
चुनाव होते ही फिर वही भाईचारा
गौरव बताते हैं कि गांव में अक्सर चुनाव ही होते रहे हैं। बुजुर्गों के अनुसार पहले दो बार सर्वसम्मति से सरपंच भी बने हैं, जिसके पहले व बाद में चुनाव ही होते रहे हैं, लेकिन इन चुनावों पर भाईचारा ही हावी रहता है। कभी भी गांव में चुनावी रंजिश नहीं रही है। चुनाव होते ही फिर वही भाईचारा दिखाई देने लगता है। इसके आगे जीत-हार भी मायने नहीं रखती। यहीं नहीं अन्य मामलों में भी गांव में भाईचारा ही सर्वोपरि रहा है।
जल संरक्षण की बेहद जरूरत
ग्रामीण बिजलाल बताते हैं कि गांव में अधिकतर लोग खेती पर ही निर्भर हैवर्तमान में धान की फसल उगाना उनकी मजबूरी हो गई है। बारिश होने के बाद यहां खेतों से पानी महीनों तक भी सूख नहीं पाता हैं। यहां जल संरक्षण करने की व्यवस्था किए जाने की जरूरत है। इससे न केवल बारिश का पानी जमीन में जाएगा बल्कि नीचे का जलस्तर भी बढ़ पाएगा, जिसके बाद ही किसान धान के अलावा दूसरी फसलें कर सकेंगे।