कुरुक्षेत्र। कुवि में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस के अंतर्गत गुरुवार को मध्यकालीन व आधुनिक इतिहास विषय पर विशेष सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लेकर इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के विभिन्न पहलुओं पर गहन चर्चा की। इस दाैरान शिक्षाविदों द्वारा कहा गया कि अब समय केवल प्रश्न करने का नहीं, बल्कि उत्तर खोजने का है।
प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने कहा कि समाज और राष्ट्र के विकास के लिए अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अब समय केवल प्रश्न करने का नहीं, बल्कि उत्तर खोजने और कार्य करने का है। आने वाले समय में ऐसा भारत बनाना होगा, जहां लोग अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व महसूस करें। उन्होंने कहा कि हमें अपनी परंपराओं को वर्तमान समय के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ीयां उन्हें सही रूप में समझ सकें और अपनाएं।
वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. एस के चहल ने कार्यक्रम के उद्देश्य और विषय-वस्तु पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस विषय के अंतर्गत इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के विभिन्न आयामों पर विद्वानों द्वारा शोध प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिससे इतिहास के अध्ययन को नई दिशा और व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से न केवल शोध को बढ़ावा मिलता है, बल्कि विद्यार्थियों को भी विषय की गहराई समझने का अवसर मिलता है।
डॉ. बी आर अंबेडकर अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास समाज की स्मृति है और इसके माध्यम से हम अपने अतीत से सीख लेकर वर्तमान और भविष्य को बेहतर बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी का विषय अत्यंत प्रासंगिक है और ऐसे आयोजन अकादमिक संवाद को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति और परंपराओं से निर्मित होती है, इसलिए इनका अध्ययन और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. राजेश श्योराण, निदेशक (पत्रिका, प्रकाशन एवं पुस्तकालय), भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने कहा कि हरियाणा की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ने भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि यह वही धरती है जो हमारे वीरों के खून से लाल हुई। यह खून किसी एक जाति, धर्म या प्रदेश का नहीं था न वह हरा था, न केसरिया वह केवल लाल था, जो भारत की एकता, साहस और बलिदान का प्रतीक है। इस अवसर पर प्रो. भगत सिंह, प्रो. आर के देसवाल, डॉ. धर्मवीर, सह-संयोजक डॉ. प्रवेश कुमार, समन्वयक डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता, सह-समन्वयक डॉ. विजेंद्र सिंह ढुल, प्रो. अशोक चौहान, डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. नीरज बातिश, डॉ. प्रवीण ढांडा, डॉ. कुलदीप पूनिया, प्रो. कुसुम लता, डॉ. श्वेता कश्यप सहित देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी की।