आज मौनी अमावस पर सरस्वती तीर्थ में स्नान और पितृ तर्पण कैसे होगा? इस बात से तीर्थ पुरोहित भी चिंतित है और श्रद्धालु भी। यहां बना सरोवर काफी समय से जलविहीन है। जबकि प्रशासन ने दावा किया था कि यहां मौनी अमावस से पहले जल की व्यवस्था की जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ।
पिछले करीब एक साल से सरस्वती तीर्थ का सरोवर जलविहीन है। पिछले साल चैत्र चौदस मेले से पूर्व तीर्थ में ताजा जल भरा जाना था, लेकिन कोविड महामारी के कारण मेले को रद्द कर दिया गया था। उसके बाद से तीर्थ जलविहीन है। आज मौनी अमावस पर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली सहित अन्य कई राज्यों से हजारों की संख्या में श्रद्घालु सरस्वती तीर्थ पर स्नान, अपने पित्तरों के निमित्त पिंडदान व तर्पण करने पहुंचेंगे। बुधवार चौदस पर भी कई राज्यों से श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पहुंचे थे, लेकिन तीर्थ जलविहीन होने के कारण उनकी आस्था को धक्का लगा। श्रद्धालुओं ने तीर्थ पर पुल के पास बने एक जलकुंड में तर्पण करके संतोष करना पड़ा। उधर, एसडीएम सोनू राम ने बताया कि श्रद्धालुओं के स्नान के लिए प्रेत पीपल के पास छोटे तालाब में व्यवस्था की गई है। यहां ट्यूबवेल के माध्यम से जल भरा गया है। इसके अलावा तीर्थ में भी पानी भरने के निर्देश दिए गए है। संवाद
ज्योतिष में मौनी अमावस का महत्व
नृसिंह ज्योतिष मठ के संचालक ज्योतिषाचार्य पंडित श्याम सुंदर ने बताया कि मौनी अमावस के दिन सूर्य व चंद्रमा गोचरवश मकर राशि में आते हैं, इसलिए यह दिन संपूर्ण शक्ति से भरा हुआ पावन अवसर बन जाता है। इस दिन मनु ऋषि का जन्म माना जाता है इसलिए भी इस अमावस्या को मौनी अमावस है। इस दिन पवित्र नदियों व तीर्थ स्थल में स्नान करने से पुण्य फल मिलता है।
मौनी अमावस पर मौन व्रत विधान
पंडित श्याम सुंदर बताया कि मौनी अमावस पर मौन व्रत रखने का विधान रहा है। कई लोग इस दिन से मौन व्रत रखते हैं। अभ्यास से अपनी वाणी को संयम करके मनुष्य को अपनी इंद्रियों को वश में रख सकता है। इससे चित्त की शुद्धि होती है। इस दिन व्यक्ति को स्नान तथा जप आदि के बाद हवन व दान करना चाहिए। मौनी अमावस पर गंगा स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान फल मिलता है।
यह कोई पहला मौका नहीं है: विनोद पचौली
तीर्थ पुरोहित विनोद पचौली ने बताया कि यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब तीर्थ में पानी नहीं है। हर अमावस पर श्रद्धालुओं को इसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। श्रद्धालुओं को तीर्थ में बगैर स्नान किए ही लौटना पड़ता है। एक साल से तीर्थ में जल नहीं है। श्रद्घालुओं को मजबूरी में सूखे घाट पर ही तर्पण करना पड़ रहा है।
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प्रशासन को नहीं श्रद्धालुओं की भावनाओं की कद्र: योगेश....
तीर्थ पुरोहित गोपाल कौशिक व योगेश शर्मा लक्की ने बताया कि प्रशासन को श्रद्घालुओं को भावनाओं की कद्र नहीं है। प्रशासन को स्थानीय संस्थाओं के सहयोग से व्यवस्था बनानी चाहिए। हर माह अमावस पर श्रद्घालुओं को तीर्थ से बगैर स्नान किए ही लौटना पड़ता है। बगैर जल के तीर्थ का कोई महत्व नहीं है।