कुरुक्षेत्र। शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। जो कि इस बार नौ अक्तूबर को है। इसे मनाने के लिए लोग तैयारियों में जुटे हैं। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी प्रकट हुई थी। इस दिन मां लक्ष्मी धरती पर आती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं।
गायत्री ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक डॉ. रामराज कौशिक के मुताबिक शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा, कौमुदी व्रत, जैसे नामों से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए देश के कई हिस्सों में इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है। इस तिथि को धन दायक माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी धरती पर आती है। चंद्रमा इस दिन अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत का बरसात होती है।
उन्होंने बताया कि सर्वार्थ सिद्धि योग में शरद पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बना हुआ है। इस दिन उत्तरभाद्रपद और रेवती नक्षत्र का संयोग है। शरद पूर्णिमा को सर्वार्थ सिद्धि योग प्रात:काल छह बजकर 18 मिनट से प्रारंभ हो रहा है और शाम चार बजकर 21 मिनट तक है। इस योग में किए गए कार्य सफल सिद्ध होते हैं। यह सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला योग है। चंद्र उदय शाम पांच बजकर 52 मिनट पर होगा। शरद पूर्णिमा को उत्तरभाद्रपद नक्षत्र शाम चार बजकर 21 मिनट तक है और उसके बाद से रेवती नक्षत्र लग जाएगा।
पूजा स्थान को सजाएं
डॉ रामराज कौशिक बताते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात अपने घर की साफ-सफाई करके पूजा स्थान को सजाना चाहिए।माता लक्ष्मी के स्वागत के लिए फूल, माला, फल और उनका प्रिय भोग खीर बनाकर रखना चाहिए। रात्रि प्रहर में जागरण करना चाहिए और माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। इस दौरान घर के मुख्य द्वार को खोलकर रखना चाहिए, ताकि माता लक्ष्मी की नजर आपके घर पर पड़े और वे आपके घर में आएं। जो लोग अपने घरों को बंद करके और गंदा रखते हैं, उनके घर के बाहर से ही माता लक्ष्मी लौट जाती है।
यह है पूजा विधि
शरद पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपने इष्टदेव से समझ व्रत का संकल्प लें। ध्यान रखें की पूजा के स्थान को अच्छे से साफ कर लें। इसके बाद मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद मूर्तियों को कुश के आसन पर रखकर जल से पवित्र कर लें। इसके बाद उन्हें गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा आदि अर्पित करें। इसके बाद पूजा और व्रत का संकल्प दौहराएं। भगवान की प्रतिमा के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं। साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु को सफेद या पीले रंग की मिठाई से भोग लगाएं। साथ ही उन्हें लाल और पीले रंग के फूल अर्पित करें।