कुरुक्षेत्र। धर्मनगरी कुरुक्षेत्र की देश-विदेश में पहचान है। पर्यटन में भी इसका अहम स्थान है। कहीं न कहीं इसका श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. गुलजारी लाल नंदा को ही जाता है, जिन्हें लोग आधुनिक कुरुक्षेत्र का शिल्पी तक कहते हैं। उन्होंने ब्रह्मसरोवर के कीचड़ से भरे तालाब को विकसित कर एशिया का सबसे सुंदर तालाब की श्रेणी में ला दिया। यहीं नहीं उन्होंने कुरुक्षेत्र को 48 कोस के रूप में पहचान दिलाई तो कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन कर दूसरे तीर्थों का भी उद्धार करने का कार्य किया।
विदित हो कि श्रीकृष्ण संग्रहालय स्थापित करने के साथ देश में मजबूत श्रम कानून लाने में भी उनका विशेष योगदान माना जाता है। वे दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे और केंद्र की सरकार में कई बार बड़ी जिम्मेदारी संभाली। पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा की 15 जनवरी को पुण्यतिथि है। उन्हें याद करते हुए केडीबी के मानद सचिव रहे एवं कुरुक्षेत्र 48 कोस तीर्थ निगरानी कमेटी के चेयरमैन मदन मोहन छाबड़ा बताते हैं कि 1967 में ब्रह्मसरोवर में स्नान करने के लिए गुलजारी लाल नंदा आए थे। वे सरोवर के नाम पर कीचड़ देख हैरान रह गए थे। लोगों ने उन्हें नहाने के लिए बाल्टी में पानी भरकर दिया था। यह देख गुलजारी लाल नंदा के मन में टीस हुई और उन्होंने सरोवर के जीर्णोद्धार करने की ठानी, जिसके बाद ब्रह्मसरोवर आज का रूप ले सका। इसके बाद 1968 में उन्होंने केडीबी की स्थापना की और वे 1990 तक अध्यक्ष रहे और अधिकतर तीर्थों की दशा सुधार दी। 1973 में कुरुक्षेत्र जिला बना। इसके बाद कुरुक्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हुआ। ब्रह्मसरोवर एशिया का सबसे बड़ा सरोवर बना तो ज्योतिसर तीर्थ, शेख चेहली का मकबरा, भद्रकाली मंदिर, स्थाणवीश्वर मंदिर, दुखभंजन मंदिर की कायाकल्प हुआ। रेलवे ओवरब्रिज, कल्पना चावला तारामंडल, पैनोरमा, श्रीकृष्ण संग्रहालय जैसे सौगातें मिलीं और आज एलिवेटिड रेलवे ट्रैक तक पहुंच गए हैं।