संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। जग ज्योति दरबार के आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं द्वारा भी महंत राजेंद्र पुरी की प्रेरणा से छठी मैया की पूजा एवं व्रत किया जा रहा है। महंत राजेंद्र पुरी ने बताया कि ब्रह्मा जी ने प्रकृति का निर्माण किया, जिसके बाद देवी प्रकृति ने स्वयं को छह रूपों बांटा था। छठे हिस्से को छठी मैया के रूप में जाना गया।
हिंदू धर्म में संतान के होने पर छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना करने का विधान है, जिससे बालक को दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सीता और माता कुंती ने भी छठ का व्रत किया था। माता सीता ने रामायण काल में ऋषि मुद्गल के आश्रम में सूर्य पूजा की थी और कुंती ने महाभारत काल में पांडवों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए यह व्रत किया था। महंत ने कहा कि छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव को समर्पित है, जो सभी प्राणियों के जीवन के आधार माने जाते हैं। उन्होंने बताया कि हर वर्ष धर्मनगरी में बड़ी संख्या में श्रद्धालु छठ पूजा में शामिल होते हैं। शनिवार को छठ महापर्व का शुभारंभ हो चुका है तथा 28 अक्तूबर को समापन होगा।
छठ पूजा का धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है महत्व : जगन्नाथ पुरी
कुरुक्षेत्र। शनिवार से प्रारंभ हुए छठ महापर्व की अखिल भारतीय श्री मारकंडेश्वर जनसेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत जगन्नाथ पुरी ने छठ महापर्व की महिमा पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में छठ महापर्व की महत्ता का उल्लेख मिलता है।
महंत जगन्नाथ पुरी कहा कि मान्यताओं के अनुसार छठी मैया को ब्रह्मा की मानस पुत्री माना जाता है और वह प्रकृति के छठे रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। छठ महापर्व के पौराणिक महत्व को महाभारत और रामायण से जुड़ी कई कथाओं में बताया गया है।
महंत कहा कि इस महापर्व में भगवान सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है, जो छठ का मुख्य आधार है। उन्होंने बताया कि राजा कर्ण ने सबसे पहले सूर्य देव की पूजा की थी। वे रोज सुबह सूर्य को अर्घ्य देते थे, जिससे उन्हें दिव्य शक्ति प्राप्त हुई। महाभारत की एक कथा के अनुसार, जब पांडव अपना राजपाट हार गए थे, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था, जिससे उनकी मनोकामनाएं पूरी हुई और पांडवों को राज्य वापस मिल गया। वनवास से लौटने के बाद भगवान राम और माता सीता ने भी सूर्यदेव का आभार प्रकट करने के लिए छठ व्रत किया था।