कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कुरुक्षेत्र थ्रू द एजेस सम्मेलन में देश-विदेश से लगभग 900 प्रतिभागियों ने भाग लिया। तीन दिनों तक चले इस आयोजन में 24 से अधिक अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें 400 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
सम्मेलन निदेशक प्रो. भगत सिंह ने बताया कि सम्मेलन में वक्ताओं ने श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक दर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन के कर्तव्य, नैतिकता, नेतृत्व और आत्मबोध का मार्गदर्शक है। उन्होंने कुरुक्षेत्र को केवल महाभारत की भूमि नहीं, बल्कि संवाद, चिंतन और ज्ञान की धरती बताया।
विजन कुरुक्षेत्र के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि शोध पत्रों में कुरुक्षेत्र के इतिहास को हड़प्पा सभ्यता, सरस्वती नदी और वैदिक परंपराओं से जोड़ते हुए लगभग 10 हजार वर्ष पुराने स्थायी जीवन के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। सम्राट हर्षवर्धन काल और विदेशी यात्री ह्वेनसांग के विवरणों का भी उल्लेख किया गया। वहीं आयोजन सचिव प्रो. आर.के. देसवाल ने बताया कि 1803 में अंग्रेजों के आगमन और 1947 के भारत विभाजन के दौरान कुरुक्षेत्र की भूमिका पर भी विस्तृत चर्चा हुई।
लोक संपर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि कुरुक्षेत्र संग्रहालय की अवधारणा रही, जिसमें 10 हजार वर्षों के इतिहास को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने की योजना बनाई गई है।
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शिक्षकों को मिले इतिहास रत्न अवॉर्ड
सम्मेलन के दौरान पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर, प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा और प्रो. देवेंद्र हांडा को इतिहास रत्न अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके साथ आयोजित प्रदर्शनी में भारत विभाजन, सिंधु-सरस्वती सभ्यता और प्राचीन सिक्कों का आकर्षक प्रदर्शन किया गया।