पलवल जिले के बंचारी गांव के नगाड़े की पहचान कुछ ऐसी है, जिसकी गूंज देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच रही है। यहां नगाड़ा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति, परंपरा और गौरव का प्रतीक है। सैकड़ों वर्षों से नगाड़े की गूंज इस गांव की पहचान बनी हुई है।
पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा को ग्रामीणों ने आज भी सहेजकर रखा है। यही वजह है कि करीब 10 हजार मतदाताओं वाले इस गांव में 50 से अधिक नगाड़ा पार्टियां हैं और नगाड़े की गूंज आज भी गांव के सामाजिक व सांस्कृतिक आयोजनों में सुनाई देती है।
बंचारी गांव की खासियत यह है कि यहां आज भी मेहमानों का स्वागत नगाड़ा बजाकर किया जाता है। गांव के कलाकारों के अनुसार, यह परंपरा महाराजा सूरजमल के समय से चली आ रही है। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं लेकिन बंचारी के लोगों ने अपनी इस विरासत को नहीं छोड़ा।
नगाड़ा बजना सम्मान, उत्साह और परंपरा से जुड़ा भाव
गांव में किसी खास अवसर पर नगाड़ा बजना आज भी सम्मान, उत्साह और परंपरा से जुड़ा भाव है। गांव के कलाकारों की पहचान अब स्थानीय आयोजनों तक सीमित नहीं रही। उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा दूसरे क्षेत्रों और विदेशों तक पहुंचने से बंचारी की सांस्कृतिक पहचान को भी विस्तार मिला है। युवा कलाकार भारत का कहना है कि बंचारी गांव में नगाड़े का महत्व किसी एक उत्सव तक सीमित नहीं है।