अमरावती महाराष्ट्र के कृषि वैज्ञानिक सुभाष पालेकर ने कहा कि रसायनिक खेती के स्थान पर जैविक खेती को अपनाना चाहिए। रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से भूमि की उर्वरा शक्ति घट रही है।
मानव जीवन के लिए खतरा पैदा हो रहा है। यदि किसान इस खतरे के प्रति जागरूक नहीं हुए तो दस साल बाद रसायनिक खेती अपने आप बंद हो जाएगी, क्योंकि भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाएगी।
वे गुरुकुल कुरुक्षेत्र में तीन दिवसीय शून्य लागत कृषि कार्यशाला और प्रशिक्षण शिविर में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। शिविर का उद्घाटन मुख्य अतिथि हरियाणा कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक सुरेश गहलावत ने किया।
पालेकर ने कहा कि रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति घट रही है और खाद्यान्न जहरीला हो रहा है।
आज ऐसी कृषि पद्धति की जरूरत है, जो किसान को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ पर्यावरण को शुद्ध और स्वच्छ बनाए रखने के अलावा पैदावार में वृद्धि हो।
सुरेश गहलावत ने कहा कि भारतीय कृषि क्षेत्र में गत चार दशकों से फसल उत्पादन में जो वृद्धि हुई है, इसका मुख्य कारण उन्नत तकनीकों को अपनाया जाना और अधिक मात्रा में उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग है।
इसके कई दुष्परिणाम सामने रहे हैं। प्राकृतिक कृषि के अभाव में उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है, जिसके कारण किसान आत्महत्या के लिए विवश हैं।
किसानों को सुखी, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। यदि किसान रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और संकर बीजों के स्थान पर जैविक कृषि को महत्व दें तो न केवल खाद्यान्न जहर मुक्त होगा, बल्कि समाज भी स्वस्थ होगा। गुरुकुल के प्राचार्य ने सुरेश गहलावत को उपहार और स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया।
गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राचार्य डॉ. देवव्रत प्राचार्य ने कहा कि जब तक लोग जैविक कृषि से उत्पादित गेहूं, चावल, सब्जियां, फल और अन्य वस्तुओं का उपयोग नही करेंगे, उनके लिए निरोगी व स्वच्छ रहना संभव नहीं होगा।
शिविर में हरियाणा, पंजाब, उड़ीसा, गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश के किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे है। इस मौके पर गुरुकुल प्रबंध समिति के प्रधान कुलवंत सिंह सैनी, उप-प्राचार्य शमशेर सिंह सांगवान, किशन जाखड़, डॉ. श्यामलाल शर्मा उपस्थित थे।