संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। गीता के दिव्य ज्ञान को शोध, पाठ्यक्रम एवं संवादों के माध्यम से शिक्षा के हर स्तर पर पहुंचाने की आवश्यकता है ताकि अगली पीढ़ी तकनीकी के साथ आत्मिक रूप से भी समृद्ध हो। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय जल्द ही बीए गीता स्टडीज प्रोग्राम को गीता संस्थान के साथ शुरू करेगा तथा भविष्य में पीजी एवं पीएचडी के स्तर पर भी ऐसे कोर्स लाए जाएंगे।
ये विचार कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम हॉल में यूआईईटी संस्थान द्वारा आयोजित श्रीमद्भगवद्गीता : विज्ञान, आधुनिक शिक्षा व जीवन प्रबंधन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कुवि ने वेल्यू एडिड कोर्स के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप गीता ज्ञान संस्थान के साथ एमओयू भी किया है। गीता धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन जीने का शास्त्र एवं जीवंत मार्गदर्शन है।
शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं बल्कि बुद्धि एवं विवेक का विकास है। वर्तमान में जब युवा पीढ़ी मानसिक तनाव एवं निर्णय असमर्थता से जूझ रहे हैं तब गीता का निष्काम कर्म का संदेश उन्हें संयम और धैर्य की ओर अग्रसर करता है। छात्रों को केवल उपाधियां ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाए, गीता इसमें अमूल्य संसाधन है।
मुख्यातिथि स्वामी ज्ञानानंद ने कहा है कि जीवन प्रबंधन की समग्र शिक्षा का सार गीता में समाहित है। गीता की शिक्षा आज के आवश्यकताओं के अनुरूप है। श्रीमद्भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि इसमें मानव जीवन की समस्याओं का समाधान मिलता है। गीता भारत का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का गौरव है। यह ग्रंथ केवल हिंदुओं के लिए नहीं बल्कि पूरी विश्व की मानवता के लिए है। गीता में अर्जुन विश्व के हर उस युवक का प्रतिनिधित्व करता है जो कहीं न कहीं मानसिक रूप से बाधित है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण शिक्षार्थी, विद्यार्थी, मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, कमांडर तथा पथ प्रदर्शक की भूमिका का निर्वहन किया है। यदि हर शिक्षक, प्रोफेसर पवित्र ग्रंथ गीता की सोच को लेकर शिक्षा दे तो निश्चित ही शिक्षा क्षेत्र में अद्भुत, सकारात्मक, रचनात्मक क्रांति का संचार होगा।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य जीवन में अपने कर्म के प्रति एक्टिव, अलर्ट एवं अवेयर रहेंगे तो एकाग्रता को प्राप्त कर जीवन में अवश्य सफलता प्राप्त कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथ को आत्मसात करने से ही विद्यार्थियों में एकाग्रता, आत्मविश्वास जागृत होगा जो उनकी स्मरण शक्ति को भी मजबूत करेगा। स्वामी ज्ञानानंद ने भविष्य में युवाओं को नशा मुक्ति, स्वस्थ युवा तथा बड़ों का सम्मान करने के लिए प्रेरित किया। यूआईईटी निदेशक प्रो. सुनील ढींगरा ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस मौके पर कार्यशाला संयोजक डॉ. राजेश अग्निहोत्री, डॉ. ममता सचदेवा, कुलसचिव डॉ. वीरेंद्र पाल, केबीडी के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल, 48 कोर्स तीर्थ समिति के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।