संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राए... छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के पावन अवसर पर इस भजन के साथ अलग-अलग जिलों में रह रहे भक्तों ने पवित्र ब्रह्मसरोवर के घाटों पर कोसी भरने की पवित्र परंपरा निभाई। यह परंपरा छठी मैया के प्रति आस्था, कृतज्ञता और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है।
कोसी भरना छठ पूजा का एक अनूठा अनुष्ठान है, जो विशेष रूप से मन्नत पूरी होने पर छठी मैया को धन्यवाद देने के लिए किया जाता है। इस दौरान घरों की छत, आंगन या घाट पर गन्नों से छत्र बनाया जाता है जिसके बीच मिट्टी का हाथी और उसके ऊपर कलश रखा जाता है। कलश में प्रसाद और पूजन सामग्री सजाई जाती है और दीपक जलाकर रातभर जागरण किया जाता है। इस अवसर पर भक्त स्थानीय लोकगीत, जिन्हें कोसी सेवना कहा जाता है को गाते हैं, जो उत्सव में भक्ति और उल्लास का रंग भरते हैं।
मूलतः बिहार के सारण जिले व वर्तमान में पानीपत में रहने वाली महिला पूनम ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कोसी भरना सुख-समृद्धि, संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से जुड़ा है। गन्नों से बना छत्र पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पंचतत्वों का प्रतीक माना जाता है, जो जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।