संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। साहब....यहां तो आज भी हर कक्षा की पहली परीक्षा अंग्रेजी की होती है। हिंदी के प्रति हमारी प्राथमिकता नहीं नहीं रही। ऐसे में कैसे अपनी मातृभाषा को बढ़ावा मिल सकता है। यह दर्द हिंदी भाषा के शिक्षकों व कॉलेज की छात्राओं का था। राजकीय कन्या महाविद्यालय पलवल में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित अमर उजाला संवाद में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए तड़प बाहर आई।
कॉलेज के प्रो. डॉ. कृष्ण कुमार ने अन्य शिक्षकों व छात्राओं के साथ चर्चा करते हुए बताया कि हमारा पूरा जीवन ही हिंदी है। भले ही हम किसी भी स्तर की पढ़ाई कर चुके हैं और कितने ही बड़े संस्थान में हो और वहां दूसरी कोई भी भाषा बोली जाती हो, लेकिन घर आते ही हम अपनी मातृभाषा में बातचीत शुरू कर देते हैं।
हम अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। सरकार भी पहली कक्षा से मॉडल स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने की नीति पर काम कर रही है, लेकिन यही बच्चे घर आते ही हिंदी में ही रमे रहते हैं। सभी कुछ हिंदी में ही हो रहा है, जिसके बावजूद हम दोहरी मानसिकता जी रहे हैं। ऐसे में हिंदी को बढ़ावा आसान नहीं है।
प्रो. सुनील थुआ बताते हैं कि सरकार की दोहरी मानसिकता के चलते ही आज तक हिंदी को पूरा सम्मान नहीं मिल पाया है। हालात यह है कि जिला मेें केयू के अलावा महज इसी कालेज में ही एमए स्तर पर हिंदी पढ़ाई जाती है जबकि यह हर कॉलेज में पढ़ाई जानी चाहिए थी।
प्रो देवेंद्र बीबीपुरिया कहते हैं कि हिंदी के प्रति सरकार गंभीर होती तो आज हर कॉलेज में हिंदी पीजी स्तर पर पढ़ाई जाती। छात्रों को मौका मिलता तो उनमें हिंदी पढ़न के लिए उत्साह भी बढ़ता।
आयोजन में कॉलेज में पीजी स्तर पर पढ़ाई कर रही सविता, निशा, स्नेहा, निर्मलजीत कौर, पूजा, कविता, स्वीटी के अलावा बीए स्तर पर पढ़ाई करने वाली आरजू, सलोनी, प्रियंका, नितिका, अंजू, मंजू, आरती, जश्नजोत कौर सहित अन्य छात्राओं ने विचार व्यक्त किए।
हिंदी भाषा को गजलकार कर रहे समृद्ध : सूबे सिंह
गांव हथीरा के राजकीय स्कूल के हिंदी शिक्षक सूबे सिंह सुजान कहते हैं कि हिंदी भाषा संस्कृत से विकसित है। हिंदी सभी भाषाओं में वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित और सटीक है। इतनी सटीकता अन्य भाषाओं में नहीं है, लेकिन अंग्रेजी भाषा का व्यवहार इसलिए विश्व में प्रसारित व प्रचारित है क्योंकि वह धनाढ्य वर्ग की भाषा रही है और यह वर्ग धन के बल पर ऐसा करता आया है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में हिंदी भाषा को हिंदी ग़जलकार ज्यादा समृद्ध कर रहे हैं वे उर्दू भाषा के लोगों में हिन्दी का प्रयोग व प्रचार प्रसार ज्यादा कर रहे हैं, जिससे धीरे धीरे उर्दू की जगह हिंदी ने ले लिया है, लेकिन दुखद है कि ग़जलकार को पूरा सम्मान नहीं दिया जाता। पिछले दो-तीन दशकों में हिंदी शिक्षण में बहुत कमियां रही हैं, जिससे स्तरीय हिंदी शिक्षण नहीं हो सका है।
उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के समय के साथ हिंदी अध्यापकों ने अपनी कोई प्रायोगिक भूमिका नहीं निभाई, बल्कि उससे अपने आप को दूर कर लिया। जिस कारण आज सोशल मीडिया पर बच्चों ने स्वयं अपने आप को स्थापित करने के लिए प्रयास किए और हिंदी भाषा में त्रुटियां अधिक बढ़ गई हैं।