कुरुक्षेत्र। करीब एक दशक पुराने भ्रूण जांच मामले में अदालत ने फैसला सुनाते हुए जांच में शामिल चिकित्सक, दलाल और जांच करवाने वाले दंपती को दोषी करार दिया है। अदालत ने मामले में चिकित्सक व दलाल को तीन-तीन साल व दंपती को एक-एक साल की कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने चिकित्सक और दलाल पर पांच-पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
यह मामला वर्ष 2016 में स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए गए डिकॉय ऑपरेशन से जुड़ा है, जिसमें सूचना मिली थी कि उत्तर प्रदेश के बिजनौर क्षेत्र में पैसे लेकर भ्रूण जांच की जा रही है। इसके बाद पीएनडीटी टीम ने ग्राहक बनाकर पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था। उस समय 18 हजार रुपये में सौदा तय हुआ था। कार्रवाई के दौरान टीम ने बिजनौर निवासी चिकित्सक कौशल, लाडवा निवासी दलाल संदीप कुमार तथा लिंग जांच करवाकर लौट रहे करनाल निवासी दंपती रिंकू और रेखा को पकड़ा था। बाद में इस मामले में कुल आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य विभाग की ओर से 25 गवाह अदालत में पेश किए गए। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने चार आरोपियों धर्मबीर, कुलदीप, रामचंद्र और दीपक को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, जबकि चिकित्सक कौशल, दलाल संदीप कुमार और दंपती रिंकू व रेखा को दोषी ठहराया गया।
अदालत ने चिकित्सक कौशल और दलाल संदीप कुमार को तीन-तीन साल के कठोर कारावास और पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं भ्रूण जांच करवाने वाले दंपती रिंकू और रेखा को एक-एक साल की कैद और एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भ्रूण जांच केवल कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है जो लिंग असंतुलन और महिला भ्रूण हत्या जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देता है। निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस तरह के मामलों में सख्त सजा जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी गतिविधियों पर रोक लग सके। स्वास्थ्य विभाग के पीएनडीटी अधिकारी डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. रमेश सभ्रवाल ने इस फैसले को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि अवैध भ्रूण जांच करने वालों के साथ-साथ इसमें शामिल होने वाले उपभोक्ताओं को भी अब कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।