पहले घाटे और फिर अन्य कारणों से वित्तीय संकट में फंसी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में लाखों का पीएफ गड़बड़झाला हुआ है। आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के वेतन से पीएफ के नाम पर काटी गई राशि का आंकड़ा करीब 80 लाख रुपये तक का बताया जा रहा है। जानकारों की मानें तो यदि इसमें पीएफ डिपार्टमेंट जुर्माना भी वसूले तो आंकड़ा एक करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुंचने का अंदेशा जताया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि कर्मचारियों के मिलने वाले मासिक भुगतान से यह राशि काटी गई, लेकिन न पीएफ खाते में जमा हुई और न ही वापस कर्मचारियों को ही मिली। अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि गई किसकी जेब में? पीएफ में सेंध की अमर उजाला की खुलासा करती खास रिपोर्ट :
केयू में विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। ताजा विवादों के साथ अब पुराने मामले भी सामने आने लगे हैं। इसमें पीएफ के नाम पर बड़ा गोलमाल सामने आया है। आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के वेतन से काटा गया पीएफ का पैसा बीच में ही गायब हो गया। यह राशि छोटी-मोटी नहीं बल्कि करीब 80 लाख रुपये तक की है। आंकड़ा बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। इतनी बड़ी रकम कहां गई? पैसा काटा गया तो पीएफ में जमा क्यों नहीं हुआ? नहीं जमा हुआ तो कर्मचारियों को वापस क्यों नहीं दिया गया? ऐसे तमाम सवालों के बीच अब यूनिवर्सिटी की मुश्किलें भी बढ़ने के आसार हैं।
छह माह के वेतन में हुआ गोलमाल
दरअसल 2014 में यूनिवर्सिटी में सर्विस प्रोवाइडर के जरिये कर्मचारियों को रखा गया था। उस वक्त तीन सर्विस प्रोवाइडर काम कर रहे थे। यानी तीन ठेकेदारों के जरिये आउटसोर्सिंग कर्मचारी रखे गए थे। कर्मचारियों ने बताया कि इनमें से एक सर्विस प्रोवाइडर के तहत करीब 800 कर्मचारी रखे गए थे। इस सर्विस प्रोवाइडर के तहत भी न्यूनतम दर पर फोर्थ क्लास कर्मचारियों को 8100 रुपये पर रखा था जबकि क्लर्क स्तर के आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को 9900 रुपये माहवार पर रखा था। लेकिन सर्विस प्रोवाइडर ने सितंबर 2014 तक ही वेतन दिया। इसके बाद छह माह तक का वेतन दिए बगैर सर्विस प्रोवाइडर भाग गया। ऐसे में 700 कर्मचारियों को वेतन ही नहीं मिला। यह वेतन 6 माह तक नहीं मिला। इधर नियमानुसार इन सभी कर्मचारी के वेतन से हर माह 12 प्रतिशत राशि पीएफ के नाम पर काटी गई।
नौकरी से निकाले गए एक आउटसोर्सिंग कर्मचारी नवीन ने बताया कि नियमानुसार सर्विस प्रोवाइडर या यूनिवर्सिटी को 13 प्रतिशत राशि पीएफ में जमा करानी होती है। इस लिहाज से यदि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की ही बात करें तो एक-एक कर्मचारी के पीएफ के नाम पर 1900 रुपये होते हैं। इन कर्मचारियों की संख्या 700 थी। यानी छह माह की पीएफ राशि कुल 79,80000 रुपये होती है। नवीन का कहना है कि यदि पीएफ डिपार्टमेंट नियमानुसार 40 प्रतिशत का जुर्माना लगाए तो यह राशि सवा करोड़ के आसपास पहुंचती है।
यूनिवर्सिटी ने वेतन दिया, पीएफ नहीं
नवीन ने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सर्विस प्रोवाइडर के भाग जाने के बाद इन आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को छह माह का वेतन दिया, लेकिन इस वेतन में पीएफ की की राशि नहीं दी गई। यह राशि न सर्विस प्रोवाइडर ने पीएफ खाते में जमा कराई न यूनिवर्सिटी ने ही कराई। ऐसे में इन कर्मचारियों का करीब 80 लाख रुपये बीच में ही गायब हो गए हैं।
यूनिवर्सिटी के पास है पीएफ का पैसा
इन कर्मचारियों के पीएफ का पैसा यूनिवर्सिटी के पास है। इस संबंध में ईपीएम कमिश्नर हरियाणा को पत्र लिखा गया था। लेकिन फर्म दिल्ली में रजिस्टर्ड है। इसके बाद दिल्ली ईपीएफ कमिश्नर को भी पत्र लिखा गया, लेकिन इस पत्र का एड्रेस ही ट्रेस आउट नहीं हो रहा है। इधर हमने इस फर्म को ब्लैक लिस्टेड कर दिया है। साथ ही चीफ सेक्रेटरी हरियाणा को भी पत्र लिखकर मांग की है कि इस फर्म को पूरे प्रदेश में ही ब्लैक लिस्टेड किया जाए।
-प्रवीण सैनी, रजिस्ट्रार केयू कुरुक्षेत्र