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जिंदा रहे तो तिरंगा फहराकर आएंगे, नहीं तो तिरंगे में लिपट कर आएंगे

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कुरुक्षेत्र। कारगिल युद्ध में पटसू की पहाड़ी (हिप्र) पर रसद पहुंचानी वाली टुकड़ी। - फोटो : Kurukshetra
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सुनील धीमान
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कुरुक्षेत्र। जिंदा रहे तो दुश्मनों को खदेड़कर चोटी पर तिरंगा फहराएंगे, नहीं तो उसी तिरंगे में लिपटकर आएंगे। देश प्रेम की इसी भावना के साथ नायब सूबेदार रविंद्र कौशिक ने कारगिल युद्ध में दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। पाकिस्तानी सेना की ओर से अंधाधुंध फायरिंग के बीच भी जान की परवाह नहीं करते हुए उन्होंने चोटी पर दुश्मनों का मुकाबला कर रहे अपने जवानों के लिए रसद पहुंचाने का कार्य किया था। उनका कहना है कि 22 साल बाद भी युद्ध का एक-एक लम्हा उनकी आंखों में कैद है।
कारगिल युद्ध की दास्तां बयां करते हुए सेवानिवृत्त नायब सूबेदार रविंद्र कौशिक-45 ने बताया कि उन दिनों वह 102वीं इंफेंटरी बटालियन में तैनात थे। उनकी ड्यूटी पठानकोट से हिमाचल प्रदेश रोहतांग दर्रा से ऊपर लड़ाई लड़ रहे भारतीय सैनिकों तक रसद (गोला बारूद) पहुंचाने की थी। पठानकोट से सैनिकों तक रसद पहुंचाने के लिए उन्हें लाहौल स्पीति, लेह लद्दाख, रोहतांग दर्रा जैसे खतरनाक रास्तों से गुजरना था। कच्चे रास्ते होने के साथ-साथ इन रास्तों पर पहाड़ से पत्थर और पानी गिरता ही रहता था। एक ओर खाई और दूसरी तरफ पहाड़ से गिर रहे पत्थर से बचते हुए रसद पहुंचाना था। यही नहीं उनकी टुकड़ी लड़ाई में शहीद हुए साथी सैनिकों को पठानकोट तक लेकर आती थी। साथी सैनिकों के शव देखकर उनका दिल पसीज जाता था और खून खौल उठता था मगर वह अपनी सेना के अनुशासन और ड्यूटी से बंधे हुए थे।
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कारगिल युद्ध 28 जून 1999 की रात भारतीय सैनिकों को गोला बारूद पहुंचाने वाली सेना की टुकड़ी पर अचानक पाकिस्तानी सेना की ओर से आरटी फायरिंग (सेलिंग) की गई। इस फायरिंग में गोला बारूद ले जा रहा ट्रक ध्वस्त हो गया तथा दो नागरिकों की जान चली गई। सेना की टुकड़ी ने अन्य ट्रकों को साइड में लगवाकर फायरिंग रुकने की प्रतीक्षा की, मगर पाकिस्तानी सैनिकों ने अंधाधुंध फायरिंग जारी रखी। ऐसे में टुकड़ी के सैनिक चिंता करने लगे, क्योंकि पाकिस्तानी सेना को जवाब देने के लिए भारतीय सैनिकों को रसद पहुंचाना जरूरी था। तब टुकड़ी अगुवाई कर रहे नायब सूबेदार रविंद्र कौशिक ने फायरिंग के बीच ही चोटी पर लड़ाई लड़ रहे भारतीय सैनिकों तक रसद पहुंचाने का निर्णय लिया। रवागनी से पहले नायब सूबेदार ने अपने साथी सैनिकों का जोश व उत्साह बढ़ाने के लिए कहा कि हमारे पास दो ही रास्ते हैं। पहला हम फायरिंग रुकने की प्रतीक्षा करें या फिर चोटी पर लड़ाई लड़ रहे हमारे बहादुर सैनिकों की मदद करें। चोटी तक पहुंचे तो दुश्मन को खदेड़कर तिरंगा फहरा देंगे नहीं तो उसी तिरंगे में लिपटकर आ जाएंगे। इसी हिम्मत, जनून, जोश व उत्साह के साथ हम आगे बढ़ गए। संवाद
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लोगों ने भी दिखाया हौसला, दुश्मन पीठ दिखाने को हुए मजबूर
कारगिल में सेना के साथ-साथ देश का प्रत्येक नागरिक भी पाकिस्तान के खिलाफ लड़ रहा था। हिमाचल प्रदेश के लोग सेना को गर्म कपड़े देते थे। हर ढाबा संचालक सैनिकों को निशुल्क खाना देता था। हर एसटीडी बूथ पर सेना के जवानों को उनके घर निशुल्क बात करने की सुविधा थी। उनकी केवल एक ही मांग थी जिन दुश्मनों ने भारत मां की ओर आंख उठाया है, उन्हें सबक सिखाना है। जवानों के साथ ही लोगों के इसी जज्बे ने दुश्मनों को पीठ दिखाने के लिए मजबूर कर दिया।
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