प्रभु हरि की भूमि हरियाणा को वो गौरव प्राप्त है, जिसने भगवान श्रीकृष्ण की चार अवस्थाओं के दर्शन किये। आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया जिस भी कोने में कृष्ण भक्त बसे हैं, वहां मनाया जा रहा है। हालांकि कोरोनाकाल में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम पिछले वर्षों के मुकाबले फीकी है, मगर घरों में इस पर्व की उमंग पर कोरोना का कोई असर नहीं है। इसी के साथ कुरुक्षेत्र वासियों और देश-दुनिया में बसे कृष्ण भक्तों के लिये सुखद समाचार ये है कि कान्हा के अगले जन्मोत्सव पर धर्मक्षेत्र में 10 करोड़ की लागत से बन रहा भगवान श्रीकृष्ण का 42 फुट ऊंचा भव्य विराट स्वरूप करीब 10 फुट ऊंचे सुंदर प्लेटफार्म पर गीता जन्मस्थली ज्योतिसर में विराजमान होगा।
वैसे कुरुक्षेत्र के साथ कृष्ण का नाता उतना ही गहरा है, जितना की जन्मभूमि मथुरा-वृंदावन और राजधानी द्वारिका से है। ये सम्मान धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र को ही प्राप्त है कि इस भूमि को भगवान श्रीकृष्ण की कर्मस्थली की मान्यता है, क्योंकि महाभारत युद्ध से पहले कुरुक्षेत्र में उन्होंने विश्व को कर्म का संदेश गीता के उपदेश दिया था। वैसे भी ये वो भूमि है जो श्रीकृष्ण के जीवनकाल की चार अवस्थाओं की साक्षी है। हरियाणा की सांस्कृतिक राजधानी कुरुक्षेत्र, जहां भगवान श्रीहरि का एक या दो नहीं, बल्कि चार बार आना हुआ। यह भूमि भगवान श्रीकृष्ण के जीवनकाल की चार अवस्थाओं की साक्षी है।
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र का यह सौभाग्य है कि उसने भगवान श्रीकृष्ण की बालवस्था, युवाकाल और 84 वर्ष के भगवान श्रीकृष्ण विराट स्वरूप महाभारत युद्ध से पहले देखा और श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकला कर्म का संदेश गीता के जरिये ज्योतिसर से विश्वभर में फैला। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर अमर उजाला ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवनकाल में कुरुक्षेत्र से जुड़े उन तथ्यों को पिरोया है, जिनकी बदौलत कुरुक्षेत्र, कृष्ण और कर्म का अनूठा संगम होता है।
यही तीन प्रमुख वजह है जोकि विश्वभर में बसे आम और खास लोगों को सदियों से धर्मनगरी कुरुक्षेत्र की ओर आकर्षित कर रही है। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण के आगमन से पहले भी कुरुभूमि का अपना एक गौरवशाली अतीत है, जिसकी बदौलत भगवान श्रीकृष्ण यह पहली और चौथी बार आए। श्रीब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के अध्यक्ष पंडित पवन शर्मा शास्त्री ने बताया धर्मग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि बाल्यावस्था में दाऊ बलराम के साथ श्रीकृष्ण पहली बार अपने माता-पिता संग 52 शक्तिपीठों में से एक श्रीदेवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ में मुंडन संस्कार के लिये आए थे।
श्रीभद्रकाली मंदिर के पीठाध्यक्ष पंडित सतपाल शर्मा के अनुसार कुरुक्षेत्र, कृष्ण और कुलदेवी काली का अनोखा संयोग भी इस भूमि से जुड़ा है, क्योंकि मां भद्रकाली यदुवंश की कुलदेवी हैं। इसी वजह से मां भद्रकाली शक्तिपीठ में ही भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार उनके कुलपुरोहित गार्ग्याचार्य द्वारा कराया गया था। देश के एकमात्र श्रीकृष्ण संग्रहालय के सेवानिवृत प्रभारी एवं पुरातत्वविद् राजेंद्र राणा ने बताया कि कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण के आगमन का दूसरा उल्लेख उनकी युवावस्था में मिलता है, तब श्रीकृष्ण अपने और उपनिषदों के गुरु घोर अंगिरस से मिलने के लिये हिमालय पर कुरुक्षेत्र से होकर ही गये थचे।
राणा के अनुसार श्रीकृष्ण तीसरी बार कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण मेले के अवसर पर आए थे। तब ब्रह्मसरोवर तट पर उन्होंने पड़ाव डाला था। ब्रह्मसरोवर तट पर स्थित श्रीव्यास गौड़िया मंठ के महंत भक्ति गौरव गिरी महाराज के मुताबिक कुरुक्षेत्र आगमन के दौरान इसी मंदिर स्थल पर श्रीकृष्ण का राधा और अन्य गोपियों से मिलन हुआ था, क्योंकि कंस वध के लंबे अंतराल के बाद इनका कुरुक्षेत्र के सूर्यग्रहण मेले मिलन संभव हुआ था। तब कुरुक्षेत्र की भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग रास रचाया था और सूर्यग्रहण के अवसर पर पवित्र स्नान के बाद गोपियां भगवानश्रीकृष्ण के रथ को खींचते हुए वृंदावन लेकर गईं।
बताया गया है कि है कि गोपियों की वृंदावन जाने की जिद के आगे भगवान श्रीकृष्ण की जब नहीं चली तो उन्होंने अपने दो रूप धरे, एक रूप को गोपियां रथ की रस्सी खींचते हुए वृंदावन ले गई, जबकि दूसरा रुप श्रीकृष्ण की राजधानी चला गया था। स्थाणु तीर्थ के महंत बंसीपुरी महाराज के अनुसार जग जाहिर है कि चौथी बार कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के पवित्र चरण महाभारत युद्ध के दौरान पड़े। इस युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ श्रीदेवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ और स्थाणु तीर्थ पर भगवान शिव की आराधना कर कौरवों पर विजयश्री की कामना की थी। महंत बंसीपुरी के मुताबिक इस युद्ध से भी बड़ा महत्व यह है कि कुरुभूमि में खड़े होकर भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से गीता ज्ञान और कर्म के संदेश विश्वभर में फैला। यही कारण है कि कुरुक्षेत्र को भगवान श्रीकृष्ण की कर्मस्थली होने का गौरव हासिल है।