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पुरातत्व विभाग के अधीन 1200 साल पुराना पाषाण द्वार गायब

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बारह वर्षों से हरियाणा पुरातत्व विभाग के अधीन 1200 साल पुराना चतुरशाखा पाषाण द्वार गायब हो चुका है। विभाग को अभी तक पता भी नहीं है। ये पाषाण द्वार अग्निवंशी क्षत्रिय परिहार वंश के शासनकाल के दौरान पृथुदक तीर्थ वशिष्ठ गुफा के बाहर प्राची में स्थापित किया गया था। हरियाणा पुरातत्व विभाग एवं संग्रहालय के उच्चाधिकारियों का कहना है कि 8 वीं सदी का यह पाषाण द्वार 12 साल से विभाग के अधीन है। समय समय पर इस स्थल पर पुरातत्व विभाग के अधिकारी मुआयना करते हैं। हैरानी की बात ये है कि विभाग के अधिकारी कह रहे हैं कि समय समय पर इस पाषाण द्वार की निगरानी निरीक्षण होता था, किस तरह होता होगा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें अभी भी यह नहीं पता कि यह अति महत्वपूर्ण धरोहर मौके से गायब हो चुकी है। बता दें कि एक साल पहले अमर उजाला ने इस द्वार की फोटो खींची थी, मंगलवार को जब मौके पर पहुंचे तो नये निर्माणकार्य के चलते ये लुप्त दिखा। पुरातत्वविद आरके राणा के मुताबिक वशिष्ठ गुफा पर लगे पाषाण द्वार की निर्माण शैली को चतुरशाखा द्वार कहा जाता है। पत्थर के इस द्वार पर चार शाखाएं हैं। जहां दाईं ओर महिला पुरुष दिख रहे हैं, वहीं मिथुन शाखा और बीच में गण शाखा है। बाईं ओर पत्र (बेलबूटे वानस्पति अलंकरण वाली शाखाएं ) हैं । पाषाण द्वार के दोनों ओर नीचे तीन तीन स्त्री पुरुषों की मूर्तियां हैं, जो शारीरिक सौष्ठव व सुडोल दिखते हैं। इन मूर्तियों में उत्तर गुप्तकालीन मूर्तिकला का प्रभाव दिखता है। द्वार के ऊपर मध्य में योग मुद्रा में बैठे किसी देवता का अंकन है। जिनके दोनों ओर योगिक मुद्रा में बैठे देवता के ऊपर लघु मंदिराकृति में दिखाई दे रहे हैं। जिस मंदिर में बैठे दिख रहे हैं उसका शीर्ष भाग उज्जैयनी शिखर से अलंकृत है। बताया जाता है कि ये बहुत पुरानी शैली है और पूरे भारत के प्राचीन मंदिरों में देखने को मिलती है।
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2008 से पुरातत्व विभाग के अधीन और सुरक्षित है धरोहर : भट्टाचार्य
पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ की उपनिदेशक बनानी भट्टाचार्य ने अमर उजाला को बताया कि ये पाषाण द्वार 2008 से विभाग के अधीन देखरेख में है। कोरोनाकाल शुरु होने से एक माह पहले अंतरराष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव के दौरान आखिरी बार इस पाषाण द्वार का मुआयना किया गया था। इसके बाद कोरोना काल शुरू होने और विभाग के पास मैनपावर की कमी के चलते कोई मौके पर नहीं गया। यहां चौंकाने वाला सत्य यह है कि ये द्वार अंतरराष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव-2020 से पहले ही लुप्त हो चुका है, क्योंकि 2019 में वशिष्ठ गुफा के पाषाण द्वार के आगे नया निर्माण हो चुका है।
विभाग पर उठे सवाल, किसका किया था 2020 में निरीक्षण
अब हरियाणा पुरातत्व विभाग पर सवालिया निशान ये खड़े हो रहे हैं कि जो पाषाण द्वार 2019 में ही अदृश्य हो चुका था तो विभाग की टीम ने 2020 में किस उसका निरीक्षण अगर किया था। उसके गायब होने की रिपोर्ट आज तक क्यों नहीं की और विभाग की उच्चाधिकारी बनानी भट्टाचार्य आज तक इस बात से अनभिज्ञ क्यों हैं, जबकि मौके से 1200 साल पुराना पाषाण द्वार लुप्त चुका है।
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उपनिदेशक ने अमर उजाला से मांगी फोटो
हरियाणा पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ की उपनिदेशक बी भट्टाचार्य से जब वशिष्ठ गुफा के पाषाण द्वार बारे जानकारी मांगी तो उन्होंने पहले सबसे पहले अमर उजाला से उस द्वार की फोटो मांगी। यह फोटो देखने के बाद उन्होंने कहा कि यह पाषाण द्वार 8 वीं सदी का है और 12 वर्षों से विभाग के अधिकार क्षेत्र सुरक्षित है।
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