पिहोवा से छह किमी उत्तर पूर्व में स्थित श्री संगमेश्वर धाम अरुणाय स्थित भगवान शिव के मंदिर की आसपास के कई प्रदेशों में बड़ी मान्यता है।
यहां पर महाशिवरात्रि और श्रावण मास की शिवरात्रि पर वार्षिक मेला लगता है। इस दौरान शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। पुराणों के अनुसार यहां भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए थे। यह स्वयं भू लिंग के रूप में मुख्य मंदिर में आज भी विराजमान हैं।
मान्यता है कि यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक और पूजन करवाने और यहां स्थित बेल वृक्ष पर धागा बांधने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मन्नत पूरी होने के बाद यहां पूजा करवाने और धागा खोलने के लिए श्रद्धालुओं को दोबारा आना पड़ता है। वर्तमान में यह तीर्थ पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी की देखरेख में है और महंत वासुदेव गिरि लाल बाबा यहां की व्यवस्था देख रहे हैं।
ऐसे बना भगवान शिव का मंदिर
यह भी मान्यता है कि महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों सहित रहते थे। एक दिन वह झाड़ियों के पास घूम रहे थे। वहां उन्हें घास के बीच एक दीमक का ढेर दिखाई दिया। जब उन्होंने अपने चिमटे से इस ढेर को कुरेद कर देखा तो उनका चिमटा किसी ठोस चीज से टकराया।
उन्होंने दीमक को हटाया, तो उन्हें वहां बेहद सुंदर और तेजस्वी शिवलिंग दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि इस शिवलिंग को यहां से उठाकर किसी साफ स्थान पर विस्थापित किया जाएग। देर शाम तक खुदाई करने के बाद भी शिवलिंग का अंतिम छोर नहीं मिला। थककर वे सो गए। रात को उनके स्वप्न में भगवान शिव आए और उन्हें प्रेरणा दी कि वे इस शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास न करें, बल्कि इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करें।
सुबह जब वे उसी स्थान पर पहुंचे तो देखा कि एक बड़ा काला सर्प शिवलिंग से लिपटा है। उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी और मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। बाद में यह मंदिर डेरा पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी कनखल हरिद्वार की देखरेख में आया। वर्ष 1942 से कुछ समय पूर्व यहां के तत्कालीन सचिव महंत गिरधर नारायाण गिरि ने यहां की दशा सुधारने का बीड़ा उठाया।
भगवान शिव की कृपा से तत्कालीन सचिव की मांग पर संस्था ने यहां मंदिर बनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी। वर्ष 1946 ई. में यहां महंत गिरधर नारायण पुरी और बाबा शरण पुरी के प्रयास से एक लाख की लागत से मंदिर और डेरे का निमार्ण पूरा हुआ। हर माह की त्रयोदशी को भी यहां मेला लगता है।
यह है पौराणिक मान्यता
मंदिर के मौजूदा प्रबंधक महंत वासुदेव गिरि लाल बाबा ने बताया कि यह तीर्थ अरुणा और सरस्वती के संगम पर स्थित है। पुराणों के अनुसार महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषि में एक-दूसरे से अधिक तपोबल हासिल करने की होड़ लगी हुई थी।
तब विश्वामित्र ने सरस्वती को छल से महर्षि वशिष्ठ को अपने आश्रम तक लाने की बात कही, ताकि वे महर्षि वशिष्ठ को समाप्त कर सकें। श्राप के डर से सरस्वती तेज बहाव के साथ महर्षि वशिष्ठ को विश्वामित्र आश्रम के द्वार तक ले आईं, लेकिन जब विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ की ओर बढ़ने लगे तो सरस्वती महर्षि वशिष्ठ को पूर्व की ओर बहा कर ले र्गइं। इससे विश्वामित्र क्रोधित हो गए और सरस्वती को खून से भरकर बहने का श्राप दे दिया।
खून का बहाव शुरू होने पर सरस्वती के किनारे राक्षसों ने डेरा डाल लिया। महर्षि वशिष्ठ ने सरस्वती को यहां प्रकट हुए शिवलिंग की आराधना करने को कहा। सरस्वती ने इसी तीर्थ पर शिव की आराधना की, तो भगवान शिव ने उसे विश्वामित्र के श्राप से मुक्त कर फिर से जलधारा से भर दिया।
तभी से यहां भगवान शिव की आराधना शुरू हो गई। मंदिर में काम करने वाले लोगों का कहना है कि साल में एक बार यहां नाग-नागिन का जोड़ा शिवलिंग पर आता है। वह जोड़ा यहां पूजा करने वाले श्रद्धालुओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। कुछ देर यहां रुकने के बाद सांप का यह जोड़ा लौट जाता है।
दही से नहीं निकलता मक्खन
मंदिर की परिचय पुस्तिका के मुताबिक यहां दही बिलोकर मक्खन नहीं निकाला जाता। यदि कोई प्रयास करता है, तो दूध खराब होकर कीड़ों में बदल जाता है। मंदिर परिसर में खाट अर्थात चारपाई का प्रयोग नहीं किया जाता। यदि कोई व्यक्ति यहां अशुद्धि फैलाने का प्रयास करता है, तो उसे दंड अवश्य मिलता है।
मनोविज्ञान केंद्र के रूप में भी है मान्यता
महानिर्वाणी के सचिव महंत वासुदेव गिरि ने बताया कि पूरा वर्ष यहां राजनीति और व्यापार से जुड़े लोगों का तांता लगा रहता है। चुनाव लड़ने से पूर्व बहुत से नेता यहां मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर यहां पूजन और धागा खोलने के लिए आते हैं। मंदिर मनोविज्ञान का केंद्र भी है।
यहां भगवान शिव के दर्शनों से अशांत मन को शांति मिलती है। मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति यहां जल चढ़ाते हैं, तो अपने को तनावमुक्त महसूस करते हैं।